भारत एक चुनावी देश है और आम बोलचाल की भाषा में कहें तो यहां हर चौथे छठे चुनाव होते रहते हैं.जनता भी चुनावों की आदि हो चुकी है और नेता तो वैसे भी चुनावों के ही आदि हैं. अब बात करते हैं कल के उपचुनाव के बारे में चूंकि अभी का चुनावी मुद्द वही है. इन चुनावों में भी जिस चुनाव की बात हो रही है कैराना के चुनाव के. इन चुनावों में बीजेपी और अन्य पार्टियों में टक्कर थी.
बसपा,सपा,कांग्रेस ने रालोद की प्रत्याशी तबस्सुम हसन को यहां समर्थन दिया था. उन्होंने बीजेपी प्रत्याशी और पूर्व सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को हराया. जैसा चुनाव के बाद होता है वैसा इस बार भी हुआ.चुनाव के बाद 2019 के लोकसभा चुनावों के बारे में चर्चाएं हुईं चूंकि विपक्षी एकता कैराना में दिखी थी तो उसको चुनावों के लिए सैंपल मानकर विश्लेषण हुए.
अधिकतर में ये लिखा बोला गया कि अगर विपक्ष एक हुआ तो बीजेपी हारेगी या उसे मुश्किल होगी पर क्या वाकई कैराना के हार-जीत के बीच का अंतर यही कहता है ? आइए नजर डालते हैं कैराना उपचुनाव के आंकड़ो पर

तबस्सुम हसन- 4,81,182 वोट

मृगाका सिंह- 4,36,564 वोट

इस तरह दोनों के बीच का अंतर 44,168 वोटों का रहा है. आपको बता दें की कैराना के इन उपचुनावों में कुल 53% मतदान हुआ है.चुनाव आयोग पर इसो बारे मेंतकोई आंकड़ा नहीं है पर एबीपी न्यूज के मुताबित 53% मतदान हुआ था. कैराना में सबसे ज्यादा आबादी मुस्लिमों की है उसके बाद जाट,दलित प्रमुख वोटर हैं.चुनाव बाद के अधिकांश विश्लेषण ये कहते हैं कि गन्ना किसानों की नाराजगी बीजेपी को भारी पड़ी और उन्होंने न बीजेपी को वोट न देकर मुस्लिम उम्मीदवार तबश्स्सुम को वोट दिया लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद के समीकरण ये बात स्वीकार करने की इजाजत नहीं देते. इसलिए 2014 के लोकसभा चुनाव में कैराना की हकीकत को देखना जरुरी था.उस समय कैराना से दो मुस्लिम प्रत्याशी थे एक तबस्सुम के बेटे नाहिद तो दूसरे देवर कँवर हसन. इस चुनाव में हुकुम सिंह विजेता बने थे.

अब इन चुनावों के अंतर को देखते हैं-

हुकुम सिंह- 565909 वोट

नाहिद हसन-329081 वोट

कंवर हसन-160414 वोट

इस तरह से हुकुम सिंह ने सपा के नाहिद हसन को 2,36,828 वोटों से मात दी थी. जो मृगांका और तबस्सुम के बीच हार जीत के अंतर से कहीं ज्यादा है. हुकुम सिंह को इन चुनाव में कुल पड़े 73 फीसदी मतों में से 50 % मत मिले थे. अगर हम देखें तो 2014 और 2018 के चुनावों में कुल वोटिंग में लगभग 20 फीसदी का अंतर है.कम मतदान के बावजूद मृगांका को 4 लाख से ऊपर वोट मिले वहीं दूसरी तरफ साझा विपक्ष और एक ही मुस्लिम उम्मीदवार और कथित गन्ना फैक्टर के बावजूद विपक्ष 5 लाख तक का आंकड़ा पार नहीं कर पाया है. खास बात ये भी है कि ये सीट मुस्लिम और दलित बहुल है जो आमतौर पर बीजेपी के वोटर नहीं माने जाते हैं.
इन आंकड़ो से जो बातें साफ होती हैं-

1.विश्लेषकों का ये दावा सही नहीं है कि बीजेपी के वोटर ने रालोद की प्रत्याशी को वोट दिया है.

2.बीजेपी का वोटर वोट देने कम निकला है लेकिन जितना निकला है उसने बीजेपी ही वोट दिया है अन्यथा मृगांका की हालत वाकई खराब हो सकती थी.

बीजेपी के वोटर बाहर न आने के भी कारण हो सकते हैं .जिस वोटर ने 2014 में बीजेपी को खुलकर वोट दिया अब वो बीजेपी से निराश है लेकिन उसके पास दूसरा विकल्प नहीं ऐसे में उसने वो उत्साह नहीं दिखाया जो 2014 में था.इसके कई कारण हो सकते हैं –

1.गन्ना किसानों की नाराजगी वाकई एक वजह हो सकती है.दूसरे यूरिया की उपलब्धता को छोड़कर किसानों के लिए सरकार की तरफ से किसी बड़ी सहायता,सुधार या घोषणा का न होना है भी उनमें मतदान के प्रति निराशा पैदा कर सकती है.

2.एक कारण ये भी है कि महज एक साल बाद वहां फिर से चुनाव होने हैं जिनका संबंध केंद्रीय सत्ता के बदलाव से है ऐसे में वोटर में शायद चुनाव को लेकर वो उत्साह ही न हो जितना मीडिया और बाहरी लोगों को था.

अब 2019 के लिए इस चुनाव का क्या संदेश है ये देखें तो पता चलता है कि विपक्ष को इस चुनाव को लेकर किसी मुगालते से बचना चाहिए. अगर वाकई हा लत देखें तो विपक्ष मजबूत स्थिति में बिल्कुल भी नहीं है खासतौर पर तब 2019 में पीएम मोदी खुद के नाम पर वोट मागेंगे.चुनाव में अभी वक्त है ऐसे में सरकार भी कोई बड़ी घोषणा कर सकती है उस स्थिति में विपक्ष के पास क्या बचेगा उसका आकलन उसे खुद करना चाहिए विचारधारा विशेष से चिढ़ने वाले बुद्धिजीवियों की फौज उसे वैसे भी बहुत नुकसान पहुंचा चुकी है.

अब सरकार के लिए संदेश की बात करें तो स्पष्ट है कि वोटर में निराशा थी.केंद्र सरकार को लोगों की इस निराशा को समझना चाहिए शायद अभी भी वक्त है. हालांकि कर्नाटक चुनावों में पीएम का जादू दिखा था लेकिन कैराना जैसी जगह का वोटर अपने हाथ में कुछ ठोस चाहता है और सरकार को उसे वो देना .अगर सरकार वो देने में कामयाब रहती है तो पीएम और उनके उस काम के बाद कोई साझा विपक्ष भी बीजेपी को रोक नहीं सकता.