दिल्ली के मंडावली में भूख से मरने वाले बच्चो की घटना की खबर सुनकर कोई कह रहा है की मानवता मर गयी है कोई सरकार को कोस रहा है। पर सच ये है की दिल्ली एनसीआर में हजारो परिवार जो झुग्गी झोपड़ी में गुजर बसर करते है उनके बच्चे कुपोषण और खाने की कमी जूझ रहे है। मनुष्य के लिए सम्मान जनक जीवन जीने की जो परिस्थितियां होनी चाहिए वो भी इन परिवारों को नसीब नहीं होती।

ना खाना बनाने की जगह, ना नहाने की जगह, ना शौच की जगह। पुराने कपड़ो, पॉलीथिन, पुरानी टीन को जोड़ जुगाड़ कर झुग्गी बनती है जिसमे अपनी गृहस्थी रख लो और उसी में सो जाओ। और ये झुग्गी भी मुफ्त में नहीं आती है इसका किराया देना होता है वो भी 200-300 रूपये महीने।

अब सवाल ये उठता है की कौन होते है ये लोग, कँहा से आते है और क्यों रहते है झुग्गी में। ये वो लोग है जो गांव में गरीबी झेल रहे है और अक्सर अपने गांव के आसपास मजदूरी या रिक्शा चलाना नहीं चाहते क्यों की हमारा समाज व्यक्ति को काम के हिसाब से देखता है। ज्यादातर ऐसे लोग अपने घर को छोड़ कर दिल्ली जैसे शहर आ जाते है की यंहा रिक्शा भी चला लेंगे तो भूखो नहीं मरेंगे और गांव में बदनामी भी नहीं होगी।

पर ये परिवार शायद इतना भी खुशनसीब नहीं था। झुग्गी के मालिक ने किराया नहीं दे पाने के कारण परिवार को निकाल दिया था। पूरा परिवार अपने एक दोस्त के यंहा मंडावली में 2 दिन से रुका हुआ था। मरने वाली बच्चियों की माँ लम्बे समय से मानसिक रूप से बीमार है और पिता एक शराब पीने का आदी रिक्शा चालक। पिता का रिक्शा २ हफ्ते पहले चोरी हो गया और उसके बाद से घर में खाने का कोई ठिकाना ना रहा।

तीनो बहने बेहद ही ख़राब हालत में घर के बाहर बैठी हुई थी, पड़ोसियों ने उन्हें पानी पिलाया और उसके थोड़ी देर बाद उनकी ख़राब हालत देख उन्हें हॉस्पिटल ले गए। जंहा डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पोस्टमॉर्टम में तीनो ही बहनों के पेट से अन्न का एक दाना तक नहीं निकला है।

हर बार की तरह जैसे देवी देवताओ को खुश करने के लिए बलि देते है वैसे ही तीन अबोध बच्चियों की बलि लेने के बाद हमारा सिस्टम जग गया है। मजिस्ट्रेट जाँच भी हो रही है, नेता मानसिक रूप से विक्षिप्त माँ से मिलने जा रहे है, आम पब्लिक भी ट्विटर और फेसबुक पर नेताओ को गरियाने और रेस्ट इन पीस टाइप संवेदना जाहिर करने में लगे हुए है। थोड़े दिनों बाद सब शांत हो जायेंगे बस इंतज़ार रहेगा एक और बलि का....