नार्वे के पूर्व पीएम जेल मेग्ने बोंडविक ने हाल ही में जम्मू कश्मीर का दौरा किया था.इस दौरे पर बोंडविक ने हुर्रियत नेताओं से बातचीत की.बोंडविक ने इसके बाद गुलाम कश्मीर का भी दौरा किया.बोंडविक के दौरे के बाद कयास लगाए जा रहे थे की क्या भारत सरकार की इस दौरे के पीछे कोई भूमिका थी.हालांकि बोंडविक ने अपने इस दौरे के बारे में खुद ही खुलासा किया है.इकोनोमिक टाइम्स को दिए गए एक इंटरव्यू में बोंडविक ने बताया की इस दौरे के पीछे आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर और श्नीनगर के डिप्टी मेयर इमरान शेख की भूमिका थी.उन्होंने साफ कहा की इस दौरे के पीछे भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं थी.आपको बता दें की ये पहला मौका है जब किसी अंतर्राष्ट्रीय नेता ने जम्मू कश्मीर का इस तरह से दौरा किया है.

बोंडविक पूर्वी अफ्रीका में संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत रह चुके हैं.वो नार्वे में द ओस्लो सेंटर नाम की एक संस्था के संस्थापक भी हैं जो दुनिया भर में लोकतंत्र और गरीबी के खिलाफ लड़ने का दावा करती है.अब अगर बात बोंडविक का भारत दौरा कराने वाले श्नी श्नी रविशंकर की करें तो उन्होंने भी कोलंबिया में चल रहे गृहयुद्ध को शांत करने में अहम भूमिका अदा की थी और कश्मीर के इर्द गिर्द भी वो घूमते रहे हैं.वैसे तो बोंडविक ने कहा की भारत सरकार की इस दौरे के पीछे कोई भूमिका नहीं थी लेकिन श्री श्री रविशंकर और भारत सरकार के संबंधों को कौन नहीं जानता.दोनों ने समय समय पर एक दूसरे का समर्थन किया है.

एनजीटी की सख्ती और तमाम पर्यावरणविदों के विरोध के बावजूद सरकार ने दिल्ली में यमुना के तट पर रविशंकर का कार्यक्रम करवाया था.ऐसे में सवाल उठता है की क्या सरकार सीधे तौर पर न सही लेकिन रविशंकर के जरिए कश्मीर में बातचीत को आगे बढ़ाना चाहती है ? और खास बात ये भी है की क्या अलगाववादी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता भी इस बातचीत का हिस्सा बनेंगे.क्योंकि अभी तक सरकार ने इन्हें एकदम हाशिए पर रखा हुआ है.देश में अगले साल लोकसभा चुनाव हैं और कश्मीर और पाकिस्तान जरूर ही इस दौरान उठने वाले प्रमुख मुद्दे होंगे.दूसरी तरफ भारत पाकिस्तान के बीच सीधी बातचीत एकदम बंद है.चुनाव को देखते हुए केंद्र की बीजेपी सरकार बिल्कुल भी ये जोखिम नहीं उठाएगी.लेकिन शायद वो इस कोशिश में भी हो की पीछे की दरवाजे से ही सही कश्मीर समस्या का शायद कोई हल निकल जाए.खास बात ये है की इकोनॉमिक टाइम्स से बातचीत में बोंडविक ने भी चुनाव बाद भारत पाकिस्तान में बातचीत शुरू होने की आशा जताई है.

बेशक कश्मीर समस्या कोई आज की नहीं है और इसका हल भी चंद दिनों में या किसी अंतर्राष्ट्रीय नेता के कुछ दौरों से नहीं हो सकता लेकिन अगर भारत सरकार अप्रत्यक्ष तौर पर भी ये पहल कर रही है तो इस पहल को सरकार की किस नीति के तौर पर देखा जाना चाहिए.शायद कश्मीर में आने वाले समय में होने वाली हलचल हमें इन सवालों के जवाब दे सके...