लोकसभा चुनाव के समर में कुछ ही दिन बाकी हैं.हालांकि चुनावों में उम्मीदवारों का नाम लगभग साफ है.इस बार चुनाव में यूं तो बड़े बड़े दिग्गज मैदान में उतरे हैं लेकिन लगभग दिग्गजों ने सुरक्षित सीटों पर दांव लगाया है.ये ऐसी सीटे हैं जहां पर इन दिग्गजों का जीतना लगभग तय है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस मामले में भाग्यशाली नहीं हैं. अमेठी में उनके खिलाफ स्मृति ईरानी मैदान में हैं. बीते चुनाव की बात करें तो वाराणसी में पीएम मोदी के खिलाफ अरविंद केजरीवाल ने मैदान में उतरकर लड़ाई को थोड़ा रोचक बनाया था.पीएम मोदी ने इस चुनाव में अरविंद केजरीवाल को शिकस्त दी थी.आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं लोकसभा चुनाव की ऐसे ही एक रोचक किस्से के बारे में.ये रोचक किस्सा है सुषमा स्वराज और सोनिया गांधी बीच 1999 में हुई जंग का.

1998 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली.1999 में लोकसभा चुनाव होने थे.कांग्रेस पार्टी में तय किया गया की सोनिया गांधी लोकसभा चुनाव लड़ेंगीं.उनके लिए दो सीटों चयन किया गया.इनमें से एक सीट यूपी की अमेठी थी जबकी दूसरी सीट थी कर्नाटक का बेल्लारी.अमेठी राजीव गांधी की भी सीट रही थी.ऐसे में वहां से सोनिया के लिए जीतना आसान था.वहीं दूसरी ओर बेल्लारी भी कांग्रेस की पुरानी मजबूत सीट रही है.यहां पर 1952 के बाद से यहां कांग्रेस हारी नहीं थी लेकिन बीजेपी ने यहां से मजबूत उम्मीदवार उतारने का फैसला किया.सुषमा स्वराज की उम्मीदवारी ने बेल्लारी के चुनाव को रोचक बना दिया.

सुषमा ने यहां सोनिया गांधी के खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाया.सुषमा ने उन दिनों में महज 30 दिनों में खुद कन्नड़ भाषा सीखी और जोरदार भाषण देना शुरू किया.आज के दौर में बेहद बदनाम रेड्डी बंधुओं का साथ उन दिनों सुषमा को मिला.जनार्दन रेड्डी और उनके भाईयों ने सुषमा के लिए यहां कड़ी मेहनत की.उन्होंने सुषमा को थाई य़ानि मां कहा और उनके पक्ष में जोरदार अभियान चलाया.सुषमा स्वराज ने इस चुनाव में सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा खूब उठाया.उनके चुनाव प्रचार की लाइन थी 'विदेशी बहू बनाम भारत की बेटी'. उन्होंने खुद को भारत की बेटी कहा और इसी आधार पर लोगों से वोट मांगे.चुनाव में सुषमा ने मेहनत तो बहुत की लेकिन वो सोनिया गांधी को चुनाव जीतने से नहीं रोक सकीं.सोनिया यहां सुषमा को 56 हजार वोटों से शिकस्त दी.चुनाव हारने के बाद सुषमा ने बयान दिया, "बेल्लारी से चुनाव इसलिए लड़ा क्योंकि सोनिया गांधी विदेशी थीं,मैं चुनाव भले हार गई लेकिन संघर्ष मेरे नाम रहा."

सोनिया गांधी बेल्लारी के साथ अमेठी से भी चुनाव जीत गईं.उसके बाद उन्होंने बेल्लारी सीट को छोड़ दिया.उसके बाद हुए उपचुनाव में वहां कांग्रेस ने जीत हासिल की.हालांकि सुषमा की मदद के बाद से वहां रेड्डी बंधुओं का प्रभाव बढ़ा और 1999 के बाद से 2019 के उपचुनाव तक वो सीट बीजेपी के कब्जे में रही.उधर सुषमा ने सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा यहीं नहीं छोड़ा.2004 में NDA की हार के बाद सुषमा ने बयान दिया कि अगर सोनिया पीएम बनेंगी तो वो अपना सिर मुंडवा लेंगी और जमीन पर सोएंगी.हालांकि सोनिया ने बाद में मनमोहन सिंह को पीएम पद के लिए चुना