साल 1918 में एक तरफ जब प्रथम विश्व युद्ध समाप्ति की ओर था उसी समय मानव इतिहास की सबसे बड़ी महामारी में एक स्पेनिश फ्लू अपने अपने घर वापस लौटते सैनिकों के जरिये पुरे विश्व में फैल रहा था। स्पैनिश फ्लू इन्फ्लून्जा वायरस H1N1 का ही एक प्रकार था जो की सालों तक चले प्रथम विश्व युद्ध में कमजोर पड़ चुके सैनिकों में प्रवेश कर गया था।

युद्ध ख़त्म होने के बाद जब ये सैनिक वापस लौटे तो इनके जरिये शहरों, कस्बो और गाँवो में आम जनता और सेना के जवान दोनों ही इस फ्लू से ग्रसित हो गए। सामान्यता ये बुखार तीन दिनों में सही हो जाता था पर ऐसे युवा जिनकी उम्र २० से 40 साल के बीच थी और जो पहले स्वस्थ थे वो इसका शिकार सबसे ज्यादा बने।

धीमे धीमे स्पेनिश फ्लू ने पूरी दुनिया की एक तिहाई आबादी को अपने चपेट में ले लिया। इस बीमारी से मरने वालों की एकदम सही संख्या पर विवाद रहा है पर ऐसा माना जाता है की पूरी दुनिया में लगभग 5 करोड़ से भी ज्यादा लोग मारे गए थे। दुनिया के ताकतवर देशो में से एक अमेरिका में 625000 से ज्यादा मौतें हुई थी। भारत में दुनिया के सभी देशों से ज्यादा 1.8 करोड़ लोग इस महामारी से मारे गए। भारत की कुल आबादी का 5 प्रतिशत इस महामारी से असमय काल के गाल में समां गया था। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी तक इस संक्रमण से पीड़ित हो गए थे।

स्पेनिश फ्लू की शुरुआत कंहा से हुई इस बारे में काफी संशय आज भी है पर ऐसा माना जाता है की यह वायरस चीन से आया था। स्पेनिश फ्लू इसका नाम पड़ने की वजह स्पेन में सबसे पहले इस बीमारी को पकडे जाना था। स्पेन युद्ध के दौरान किसी भी पक्ष में शामिल नहीं था और इसी वजह से उसने मीडिया पर सेंसरशिप नहीं लगा रखी थी। जिस वजह से वंहा की मीडिया ने इस बीमारी के सही आंकड़े छापने शुरू कर दिए। जिस वजह से दुनिया के बाकी देशों के नागरिको को लगा की ये बीमारी स्पेन से आयी है और इसे स्पेनिश फ्लू नाम दे दिया गया।