कांग्रेस के 22 नेताओं की चिट्ठी के बाद शुरू हुए विवाद का कल शाम तात्कालिक पटाक्षेप हो गया. CWC की बैठक के बाद ऐलान हुआ कि अतंरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने पद पर बनीं रहेंगी. इससे पहले कल का कांग्रेस के लिए बड़ा तनाव वाला रहा. 22 नेताओं की चिट्ठी पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया और उसके बाद गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल के सार्वजनिक बयानों के बाद कांग्रेस की खासी किरकिरी हुई. पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस नेताओं ने मांग की थी कि राहुल गांधी दोबारा अध्यक्ष पद संभाले. वहीं राहुल गांधी अध्यक्ष न बनने की जिद पर अड़े हुए थे, गांधी परिवार से बाहर का अध्यक्ष बनने की मांग पर राहुल गांधी को प्रियंका गांधी का समर्थन भी मिला. इसी बीच सवाल उठता है कि अभी कांग्रेस जिन हालात से गुजर रही है उसमें गांधी परिवार के बाहर का अध्यक्ष बनने पर क्या पार्टी को कोई बूस्ट मिल सकता है, या इससे हालात और भी बिगड़ सकते हैं.

कल पूरे दिन के घटनाक्रम पर एक नजर डालते हैं. एनडीटीवी के मुताबिक, कांग्रेस के दो नेताओं की राज्यसभा सदस्यता खत्म होने वाली है और इन्हें शक है कि पार्टी इन्हें शायद दोबारा राज्यसभा न भेजे. ऐसे में इन दोनों नेताओं ने महाराष्ट्र की एक पार्टी से बात की और दबाव बनाने के लिए एक चिट्ठी लिखी, जिसमें घुमा फिराकर सोनिया गांधी से इस्तीफा ही मांग लिया गया. खास बात ये है कि ये चिट्ठी मीडिया तक भी पहुंच गई. ऐसे में आज कांग्रेस की CWC की बैठक बुलाई गई. कांग्रेस के एक नेता जूम पर हो रही इस बैठक से जानकारी लीक कर रहे थे. बैठक से निकली जानकारी के मुताबिक, राहुल गांधी ने चिट्ठी लिखने वाले नेताओं पर बीजेपी से मिलीभगत करने का आरोप लगा दिया. ऐसे में चिट्ठी लिखने वाले वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और कपिब सिब्बल भड़क गए. आजाद ने जहां आरोप सही साबित होने पर इस्तीफे की पेशकश कर डाली वहीं सिब्बल ने भी ट्टीट करके राहुल के बयान पर आपत्ति जताई. हालांकि, बाद में दोनों नेताओं ने अपने बयान वापस ले लिए.

अब कांग्रेस के उन नेताओं के बारे में बात करते हैं जो गांधी परिवार के अलावा, कांग्रेस की कमान संभाल सकते हैं. केंद्र की राजनीति की बात करें तो गुलाम नबी आजाद का नाम आता है. आजाद की राज्यसभा सदस्यता फरवरी 2021 में खत्म हो रही है, ऐसे में एनडीटीवी की खबर के मुताबिक आजाद उन नेताओं में शामिल हो सकते हैं जिन्होंने दबाव बनाने के लिए खत लिखा. ऐसे में गुलाम नबी की पार्टी के प्रति निष्ठा पर सवाल खड़े होते हैं.

बीते समय में अगर देखें तो सीताराम केसरी के बाद 1998 से 2017 तक सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष रही हैं. इस तरह उन्होंने 19 सालों तक कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभाला. इस बीच पार्टी ने 2004 और 2009 में लोकसभा चुनाव जीते. पूरे पांच साल सरकारें चलाईं और राज्यों में भी जीत हासिल की.

हालांकि 2014 का चुनाव कांग्रेस की बड़ी असफलता साबित हुआ, जब पार्टी महज 44 सीटें जीत सकी. खास बात ये है कि इतनी बड़ी हार के बाद बावजूद सोनिया गांधी अपने पद पर बनीं रहीं और सत्ता के एक वंशानुगत स्थानांनतरण के तहत उन्होंने एक सामान्य हालत में अपने बेटे राहुल गांधी को गद्दी सौंप दी. 2014 के बाद कई राज्यों में बड़ी हार से सदमे में गई कांग्रेस का हार का सिलसिला आगे भी जारी रहा. हालांकि, 2019 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने जरूर पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई. राहुल के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव भी लड़ा गया.

राफेल से लेकर न्याय तक राहुल गांधी ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की लेकिन वो कामयाब नहीं हो सके और बीजेपी ने अकेले दम पर चुनाव में 300 सीटें जीत लीं. कांग्रेस को 54 सीटें मिलीं और खुद राहुल गांधी अपनी पुश्तैनी अमेठी लोकसभा सीट से चुनाव हार गए. राहुल अपनी मां के पदचिन्हों पर नहीं चले और कांग्रेस की हार के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया.

हाल के दिनों में जिन तीन बड़े राज्यों में पार्टी सत्ता में आयी उनमे से एक मध्य प्रदेश में बहुमत में होने के बाद भी आंतरिक कलह की वजह से पार्टी सत्ता से बाहर हो गयी। जबकि राज्य में कांग्रेस पार्टी 15 साल बाद सत्ता में वापस आयी थी। मध्य प्रदेश में सत्ता गवांने के बाद राजस्थान में भी पार्टी के हाथ से सत्ता जाते जाते रह गयी।

सचिन पायलट ने जिस तरह से पार्टी से बगावत की और राजस्थान सरकार के संकट को ख़त्म करने में गाँधी परिवार की कोई खास भूमिका नजर नहीं आयी। सचिन पायलट के पास संख्या बल न होने की वजह से बीजेपी ने उन्हें कोई खास भाव नहीं दिया और सचिन पायलट पद गँवा कर कांग्रेस में बने रहे।

पूर्व उत्तर भारत जिसे एक समय कांग्रेस का गढ़ माना जाता था और बीजेपी का नामो निशान नहीं था वंहा कांग्रेस का नाम दूर दूर तक सुनाई नहीं देता। मणिपुर में कांग्रेस ने बीजेपी की सरकार गिराने की कोशिश की पर आखिरी समय में उसमे भी असफल रहे।

लगातार एक के बाद एक असफलता ने गाँधी परिवार की पकड़ कांग्रेस से ढीली कर दी है। पर सवाल ये है की जिस पार्टी के वरिष्ठ नेता राज्य सभा सीट मिलेगी या नहीं इस पर शक होने पर पार्टी अध्यक्ष के खिलाफ बिगुल बजा देते है। ऐसे में गाँधी परिवार के बिना कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व का बचे रह पाना ही मुश्किल हो जायेगा