एम्स में डॉक्टर तक पहुंचना किस तरह एक जंग के समान है ये हमने आपको पिछले लेख में बताया. दरअसल एम्स में भीड़ होना एक अलग समस्या है उसके लिए राज्यों में एम्स जैसे अस्पताल का न होना है दिल्ली एम्स में मरीजों के बैठने तक की उचित व्यवस्था नहीं है। यंहा तक की जब मरीज डॉक्टर को ओपीडी में दिखाने जाता है तो मरीज के लिए बैठने की कोई व्यवस्था ही नहीं है, खड़े खड़े अपनी दिक्कत बताये और डॉक्टर भी खानापूर्ति करते हुए ही नजर आते है। खासतौर से उस जगह जहां यूपी,बिहार के तमाम गरीब और अनपढ़ लोग आते हों जिन्हें दिल्ली का नाम सुनते ही घबराहट होती हो.

जी हां दिल्ली एम्स में इन सभी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. एक नागरिक के तौर पर लगता है कि लोगों की संख्या न सही तो कम से कम इन सुविधाओं को तो ठीक किया ही जा सकता है.जब पिताजी को डॉक्टर के पास जाने पहुंच पाने का मौका मिला तो देखा कि जिन सीढ़ियों से डॉक्टर के केबिन तक पहुंचना था वो बेहद ही संकरी थीं. इन सीढ़ियों पर ही लोगों की लाइन लगी हुई थी. हालत ये है कि अगर एक बार आप ऊपर तक पहुंच जाएं तो नीचे वापस आ पाना मुश्किल है.

डॉक्टरों के रुम में मरीजों के बैठने की व्यवस्था बेहाल है.हालत वही है कि एक दो बेंचे पड़ी हैं बाकि अगर आपको बैठना है तो आपको या तो जमीन में बैठना होगा या बीमारी में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करना होगा.बैठने पर वैसे भी आपको चैन नहीं मिलना है क्योंकि वहां के गार्ड इसके लिए आपको डांटते रहेंगे.खैर शायद वो भी अपना काम कर रहे होंगे,आदेशों का पालन कर रहे होंगे.इसी बीच आपको पूरे परिसर में धूप में स्ट्रेचर या बगैर स्ट्रेचर के लेटे कुछ मरीज भी दिख जाएंगे.

हीमैटोलॉजी विभाग हफ्ते में 3 दिन खुलता है. इन 3 दिनों में कुल 6 डॉक्टर यानि हर दिन 6 डॉक्टर वहां बैठते हैं. इन 6 डॉक्टरों में से कोई भी प्रोफेसर स्तर का नहीं है. हालांकि एम्स से पढ़े लोगों का एक स्तर होता है लेकिन फिर भी इतने बड़े संस्थान में हीमैटोलॉजी जैसे विभाग में किसी प्रोफेसर का न होना अपने आप में एक कहानी कहता है.आमतौर पर सरकारी कर्मचारी कई बार देर से आते हैं और एम्स के डॉक्टर भी इस आदत से अछूते नहीं हैं. हालांकि हर दफ्तर में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें समय से आने का शौक होता है तो यहां भी एक डॉक्टर ऐसी ही मिलीं.

अब जब डॉक्टर को आप दिखातें हैं खुद की समस्या बताते हैं तो वो आपको कुछ टेस्ट लिखते हैं. उस टेस्ट के लिए ब्लड सैंपल लेने की जगह तो पास में ही है लेकिन उसकी रिपोर्ट के लिए आपको एम्स की खाक छाननी पड़ेगी.दरअसल पैथॉलाजी विभाग हीमैटोलॉजी विभाग की इमारत से एम्स परिसर में बिल्कुल अलग है.शायद अगर आप समय से पहले ही इसे देख न लें तो जब तक आप इसे ढ़ूढ़ेंगे तब तक डॉक्टर को दिखाने का अपना मौका गंवा चुके होंगे. इसलिए दूसरी इमारत में बने इस पैथालॉजी विभाग को ढूंढना समय से पहले बेहद जरूरी है अन्यथा आप अपनी जांच रिपोर्ट तो भूल ही जाइए.

पिताजी इससे पहले एम्स 2002 में आए थे. उनका मानना है कि तब हालत इससे कहीं अच्छी थी.तमाम बदहाली की खबरें सुनने के बाद भी उनकी हिम्मत हुई की वो दोबारा एम्स में दिखा सकें पर इस बार वो हिम्मत हार चुके हैं.अब वो दोबारा एम्स में नहीं आना चाहते क्योंकि ये अपने आप में बीमार कर देने वाला है.लेकिन हर आदमी हिम्मत नहीं हार सकता उसे आना ही पड़ता है और ऐसे ही निबटना पड़ता है.हालांकि एक बार के बाद दोबारा डॉक्टर तक पहुंचना थोड़ा आसान है लेकिन फिर भी पहली बार के बाद हिम्मत बची भी होनी चाहिए.जिस दौरान पिताजी एम्स के चक्कर के लगा रहे थे मुझे डर था कि कहीं वो इस एम्स के चक्कर में किसी दूसरी बीमारी के शिकार न हो जाएं.

भारत में सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सेवाओं की हालत ऐसी ही है. कब सुधरेगीं पता नहीं. कभी कभी लगता है कि वाकई भारत में सबकुछ भगवान भरोसे ही चल रहा है लेकिन फिर मांझी फिल्म का वो डॉयलॉग य़ाद आता है भगवान के भरोसे मत बैठिए क्या पता भगवान आपके भरोसे बैठा हो.......

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