तीन बार दिल्ली की सीएम रहीं कांग्रेस की कद्दावर नेता शीला दीक्षित का कल निधन हो गया. वो बीते कुछ समय से बीमार चल रही थीं. 81 साल की शीला दीक्षित को दिल्ली में उनके 15 साल के कार्यकाल के लिए जाना जाता है. उस दौर में भी जब अटल बिहार वाजपेयी के वक्त बीजेपी उफान पर थी वो दिल्ली में शीला से पार नहीं पा सकी. शीला दीक्षित बारे में कहा जाता है कि दिल्ली के विकास को उन्होंने एक नया आयाम दिया. 15 साल के कार्यकाल में 70 फ्लाईओवर दिए. मेट्रो दी और विकास की एक परिभाषा दी.

शीला केंद्र में बीजेपी और कांग्रेस दोनों की सरकार रहते दिल्ली की सीएम रहीं. चूंकि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है इसलिए वहां केंद्र की भूमिका अहम है. खास बात ये है कि केंद्र में बीजेपी सरकर रहते शीला का केंद्र के साथ झगड़ा कभी सुर्खियां नहीं बना. दोनों ने साथ मिलकर काम किया. कभी दिल्ली के एलजी के साथ उनकी भिड़ंत नहीं हुई. कांग्रेस सरकार के समय में जब जब शीला को लगा कि विरोध में आवाज उठानी चाहिए, उन्होंने वहां विरोध भी किया.

2013 में शीला दीक्षित के नेतत्व में कांग्रेस दिल्ली में चुनाव हार गई. शीला दीक्षित इस चुनाव में खुद भी अरविंद केजरीवाल से नई दिल्ली सीट से 25 हजार से ज्यादा वोटों से हार गईं. इस चुनाव के पहले शीला दीक्षित का एक बयान खासी सुर्खियों में रहा था. शीला दीक्षित ने दरअसल अरविंद केजरीवाल को छोटा नेता बताया और कहा कि वो उनके सामने क्या टिक पाएंगे. चुनाव हुआ, शीला को हार का सामना करना पड़ा. अरविंद केजरीवाल को हल्के में लेना शीला को भारी पड़ा. हालांकि चुनाव बाद शीला दीक्षित ने इसे महसूस भी किया. जब दिल्ली में शीला से हार की वजह पूछी गई तो शीला ने कहा, "हमने केजरीवाल को उतनी गंभीरता से नहीं लिया, जितना लेना चाहिए था. केजरीवाल ने बहुत सी चीजें कह दीं 'फ़्री' पानी दे दूंगा, 'फ़्री' बिजली दे दूंगा, इसका बहुत असर हुआ. लोग उनकी बातों में आ गए. "

2013 में खुद की हार का काफी कुछ दोषी वो केंद्र की कांग्रेस सरकार को भी जिम्मेदार मानती थी. अपनी हार का एक कारण उन्होंने केंद्र सरकार के खिलाफ गुस्से को भी बताया था. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "बहुत कम लोगों को पता था कि कानून और व्यवस्था दिल्ली सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं थी, बल्कि केंद्र सरकार की थी. तब तक केंद्र सरकार भी 2जी, 4जी जैसे कई घोटालों का शिकार हो चुकी थी, जिसका ख़ामियाज़ा हमें भी भुगतना पड़ा.''

अरविंद केजरीवाल का एलजी और केंद्र से टकराव चर्चा में रहता है. शीला दीक्षित से जब जब इस बारे में पूछा गया तो विरोधी होने के बावजूद उन्होंने हमेशा एक संतुलित राय दी. बताया कि अपने दिनों में किस तरह से शासन चलाती थीं. उनके राजनैतिक कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस में 2017 में यूपी चुनाव में सीएम पद का उम्मीदवार बना दिया था. वो यूपी आईं, उन्होंने काम भी किया हालांकि उनके स्वास्थ्य और कांग्रेस की खुद की हालत ने इसकी इजाजत नहीं दी और उन्हें वापस जाना पड़ा. हाल ही में लोकसभा चुनाव में शीला को हराने के बाद मनोज तिवारी भी उनका आशीर्वाद लेने उनके घर गए थे.

दिल्ली की जनता में उनकी अपनी एक छवि थी जिसकी वजह से ही उनकी वापसी प्रदेश अध्यक्ष पद पर हुई. हालांकि से आप से गठबंधन को लेकर पार्टी में उनका काफी टकराव हुआ. हाल ही में दिल्ली कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको से भी उनके मतभेद सुर्खियां बने. दिल्ली में फिलहाल केजरीवाल की सत्ता है और लोकसभा में यहां बीजेपी जीती है लेकिन कई दिल्लीवासियों से अगर उनकी राय पूछी जाती है तो आज भी वो कहते हैं कि दिल्ली में तो सब शीला का दिया हुआ है. फिलहाल शीला दीक्षित हमारे बीच से जा चुकी हैं लेकिन दिल्ली में शासन का जो मॉडल उन्होंने पेश किया है, वो शानदार है.