घटना सागर की है। मेरे ससुरजी ने 17-18 मई को तबीयत ठीक न लगने की बात कही। उन्होंने हल्का बुखार होने की बात कही, और आराम करते रहे। बुखार न उतरने की स्थिति में अगले दिन स्थानीय डॉक्टर को दिखाया और दवा ली. उससे भी हालत सुधरी नहीं बल्कि, थोड़ी सर्दी खाँसी भी शुरू हुई। शाम होने तक कोरोना के लक्षण लगने लगे थे लेकिन अच्छे खासे एक्टिव थे तो हम लोग स्थिति की गंभीरता को समझे नहीं। उन्होंने इसे मौसम के बदलने और शायद लू लगने जैसे कारण बताते हुए अपनी चालू दवाई और आराम करने की बात कही।

अगले दिन उन्होंने स्वयं अनुभव किया कि स्थिति ठीक नहीं है और वे स्वयं समझ गए कि लक्षण कोरोना के हैं। और अब अस्पताल जाना ही पड़ेगा। वे तीसरे दिन जिला अस्पताल पहुँचे जहाँ डॉक्टर के कहने पर उनकी कोरोना जांच का सैंपल लेकर घर भेज दिया गया। डॉक्टर उनकी आयु और परिस्थिति देखकर जांच के परिणाम आने तक अस्पताल में भर्ती करके देखभाल कर लेते तो बेहतर होता। घर पर उनकी स्थिति बिगड़ती गई।उनके एक्टिव रहने के कारण किसी को यह नहीं सूझा कि किसी प्राइवेट अस्पताल में भी दिखा लिया जाए।लॉकडाउन के कारण झिझकते भी रहे।

उनकी जांच रिपोर्ट शुक्रवार 22 मई को आनी थी। सैंपल 20 मई को लिया गया था। इस बीच कोई और रास्ता नहीं था। उन्होंने अपनी हालत समझते हुए फिर से जिला अस्पताल (कोरोना के लिए निर्धारित) ले चलने की बात कही और वे आराम से बाइक पर बैठ कर चले गए।

अब तक उनकी हालत गंभीर हो चुकी थी, इस बार अस्पताल में डॉक्टरों ने उन्हें भर्ती कर लिया और आइसोलेशन वार्ड में ले गए। रिपोर्ट अब भी आनी बाकी थी। उनसे उनकी डिटेल वगैरह ली गई। चार बजे शाम तक तो उनसे परिवार की बात होती रही। छह बजे उनकी रिपोर्ट में कोरोना पॉजिटिव पाया गया। उन्हें कोविड वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया और उसके बाद परिवार की उनसे कोई बात नहीं हुई। फिर उसी रात आठ बजे के आसपास उनको वेंटीलेटर पर रखे जाने का समाचार मिला और रात दस बजे करीब उनके देहांत का समाचार। किसी को कुछ नहीं पता कि उन्हें क्या इलाज दिया गया, उनके साथ क्या हुआ।

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उसके बाद किसी को कुछ सूझा ही नहीं कि किसी से कुछ पूछें या बात करें। सुबह जब तक परिवार संभल पाता प्रशासन उनका अन्तिम संस्कार कर चुका था। किसी को अन्तिम संस्कार का पता ही नहीं चला। उसके बाद परिवार के सभी लोगों को क्वारंटाइन कर दिया गया। दिनभर यहाँ वहाँ फोन करने के बाद पता चला कि प्रशासन ने स्वयं ही अंतिम संस्कार कर दिया है। और किसी को कोई अनुमति नहीं है। क्षेत्र सील हो गया।

किसी को पता नहीं है कब जांच कराना है और कब अस्पताल में भर्ती होना है। यह निर्णय डॉक्टरों को करना है और प्रशासन को उनको सभी सुविधाएं देनी हैं। अनुभव तो कहता है कि अगर कोरोना की रिपोर्ट आने में समय लग रहा है तो रिपोर्ट आने तक लक्षण वाले मरीजों को डॉक्टरों की देखरेख में रखा जाए। आप लोगों को ऐसे ही नहीं छोड़ सकते। घरों में इलाज नहीं हो सकता। कोई पिता अपने बच्चों के सामने बीमारी को लेकर लाचार नहीं दिखता, जब पूछो तो यही कहता है मैं ठीक हूँ बेटा अभी ठीक हो जाऊँगा। और अपनी तकलीफ दबा जाता है। और माँ तो कभी कहती ही नहीं कि कोई दर्द है।

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फिर कोई समझ पाता है कोई नहीं भी समझ पाता कि सामने वाला अपनी तकलीफ छिपा रहा है। खो देने के बाद लगता है क्या क्या किया जा सकता था। शायद किसी दूसरे डॉक्टर को दिखाया जा सकता था, दूसरे अस्पताल ले जाया जा सकता था,जांच दो दिन पहले करवाई जा सकती थी, जांच की रिपोर्ट एक दिन पहले आ सकती थी। सिर्फ प्रश्न रह जाते हैं कि किससे कहाँ कैसी गलती हुई। इसलिए सरकारों से अनुरोध है हमारे बुजुर्गों को ऐसे ही मरा हुआ न समझ लें । वे अगर कोरोना की जांच करवाने आ रहे हैं तो बिना मतलब में नहीं आ रहे हैं।और अगर लक्षण दिख रहे हैं तो उन्हें डॉक्टर अपनी देख रेख में रखे। रिपोर्ट आने की प्रतीक्षा में न जाने कितने लोग प्राण गँवा देंगे। अधिकतर कोरोना पेशेंट्स को जूनियर डॉक्टर देख रहे हैं। सीनियर डॉक्टर जो शायद वृद्ध भी हैं चाहे तो उनकी सेवाएँ ली जानी चाहिए।

अगर कोई डॉक्टर सीधे कोरोना वार्ड में किसी कारण सीधा नहीं जा सकता, वो अपने साथियों का लोड कम कर सकते हैं। वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग से लोगों की मदद करके। बहुत से डॉक्टर ऐसा कर रहे हैं । यह सुविधा छोटे शहरों तक पहुँचनी चाहिए। इससे अस्पतालों का लोड कम हो सकता है।

(वयक्तिगत अनुभव अजय चंदेल ने अपने ट्विटर अकाउंट @chandeltweets से शेयर किया है)