फ्रांस लगातार इस्लामिक उग्रवादियों की हिंसा का शिकार हो रहा है. इस्लाम के अपमान के नाम पर लोगों की हत्याएं की जा रही हैं. ऐसे में फ्रांसीसी राष्ट्रपति खुलकर इस्लामिक कट्टरपंथ के खिलाफ बोल रहे हैं और वो तमाम इस्लामिक देशों और लोगों के निशाने पर हैं. भारत में भी इस्लाम को मानने वाले मैंक्रों का विरोध कर रहे हैं. हालांकि भारत खुलकर इस मुद्दे पर फ्रांस के साथ खड़ा और बाकायदा एक बयान जारी करके इसका एलान कर चुका है. मैंक्रों को एक उदारवादी नेता के तौर पर जाना जाता रहा है. जब वो फ्रांस के राष्ट्रपति चुने गए थे तब भारत समेत दुनियाभर के बुद्धिजीवियों ने इसका स्वागत किया था. अभी के समय में मैंक्रों उन्हीं तमाम लोगों के निशाने पर हैं. उनके बयानों को मुस्लिमों को उकसाने वाला बताया जा रहा है. कुल मिलाकर अभी जो मैंक्रों कर रहे हैं वो उनके पुराने बयानों से एक दम अलग है. शायद यह वक्त की मांग है, मैंक्रों एक राष्ट्रपति के तौर वही कर रहे हैं जो उन्हें करना चाहिए. सवाल पैदा होता है कि क्या भारत में कांग्रेस ने सत्ता में रहते वो किया जिसकी जरूरत थी? यह सवाल इसलिए है क्योंकि बीजेपी हिंदुत्व और नकली सेकुलरिज्म पर सवाल उठाकर ही 2014 में सत्ता में आई थी. क्या कांग्रेस ने ही बीजेपी के लिए एक रास्ता तैयार किया?

भारत में कांग्रेस शासन काल में कई बम धमाके और आतंकी हमले हुए. सभी में साफ तौर पर एक ही धर्म से जुड़े लोगों का नाम सामने आता रहा लेकिन कांग्रेस और तमाम बुद्धिजीवी सच को नकार कर, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता कि रट लगाए रहे. हालत तो ये भी थी कि दिल्ली पुलिस बाटला हाउस में आतंकियों का एनकाउंटर करती है. एक पुलिस इस्पेक्टर शहीद भी होता है और दिग्विजय सिंह जैसे नेता इस एनकाउंटर पर सवाल उठे देते हैं. अपनी ही पार्टी की सरकार के दौरान दिग्विजय सिंह ने ऐसा किया. सलमान खुर्शीद ने कहा कि सोनिया गांधी ने आतंकियों के लिए आंसू बहाए थे. हद तो तब हो गई जब मुंबई में हमले हुए और इसको दिग्विजय सिंह ने RSS की साजिश बता दिया. मतलब इस्लामिक आतंकवाद को न केवल बचाया गया बल्कि उल्टे एक नई थ्योरी ही गढ़ दी गई. विकिलीक्स की एक केबल में खुलासा हुआ कि राहुल गांधी ने हिंदू आतंकवाद को ज्यादा चिंता का विषय बताया. भारत में हिंदू आतंकवाद और आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता की थ्योरी समानांतर रूप से चल रही थीं. ये सब सत्ताधारी कांग्रेस के नेताओं की देखरेख में हो रहा था. खुद को सेकुलर कहने वाले तमाम दल भी कांग्रेस की राह पर ही थे.

दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी गुजरात दंगों के बाद हिंदुत्व के चेहरे के तौर पर उभर चुके थे. वो आक्रामक और बेहद खुले अंदाज में वो अपनी बात रखते थे. 2008 के आतंकी हमले हों या इसके बाद, नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस की कथित सेकुलर राजनीति को जमकर भुनाया. 2013 में पीएम पद के उम्मीदवार बनने के बाद तो मोदी ने धर्म और विकास का कॉकटेल तैयार किया और 2014 में बड़ी जीत हासिल की. चुनाव से ठीक पहले भी कांग्रेस को होश नहीं आया और उसने सांप्रदायिकता विरोधी बिल लाया. यह बिल पास नहीं हो पाया लेकिन इसके प्रावधान दंगा होने की स्थिति में हर हाल में बहुसंख्यकों को दोषी ठहराने वाले थे. कांग्रेस और सहयोगी दलों की इस मूर्खतापूर्ण राजनीति ने बीजेपी के लिए एक रास्ता तैयार किया. कांग्रेस ने सच की बजाय वोट बैंक को चुना और लंबे समय के लिए सत्ता से बाहर हो गई.

इमैनुएल मैंक्रों उदारवादी हैं लेकिन जब सच बोलना है तब खुलकर बोल रहे हैं. वो एक नेता की बोल रहे हैं जिसकी उनके देश को जरूरत है. अगर यही मैंक्रों खुलकर इस्लामिक कट्टरपंथियों का बचाव करते तो देश में दक्षिणंपथ को बड़ी आक्सीजन मिलती. मैंक्रों फिलहाल दुतरफा उग्रवाद से फ्रांस को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. भारत में भी कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी को ऐसा ही करना चाहिए था और तब नहीं तो कम से कम अब सच बोलना शुरु कर दें. शायद कांग्रेस ने सच बोला होता तो आज न नरेंद्र मोदी इस पायदान पर होते और न ही योगी आदित्यनाथ यूपी के सीएम बन पाते. इमैनुएल मैंक्रों एक उदाहरण हैं कि एक नेता को कैसे बोलना चाहिए लेकिन भारत के कथित सेकुलर लोग और पार्टियां शायद ही इससे कुछ सबक ले पाएं.