देश में महिला राष्ट्रपति और महिला पीएम, सीएम से लेकर खिलाड़ियों तक की बात खूब की जाती है. उनके जरिए महिला सशक्तिकरण की कहानी भी गढ़ी जाती हैं. इन कहानियों के बीच महात्मा गांधी के बेहतर पंचायती राज का सपना याद आता है. पंचायतें शासन की सबसे छोटी ईकाई हैं और इनके जरिए शासन समाज से सबसे बेहतर ढंग से जुड़ता है. इन पंचायतों की नजर से महिला सशक्तिकरण को देखने पर तस्वीर कितनी साफ होती है?

पंचायती राज मंत्रालय के आंकड़ो की मानें तो यूपी देश के उन राज्यों में शीर्ष पर है जहां महिला प्रधानों की संख्या सबसे ज्यादा है. मंत्रालय के मुताबिक यूपी में 19992 महिला प्रधान हैं. यूपी के बाद महाराष्ट्र इस सूची में दूसरे नंबर पर आता है जहां 13960 महिला प्रधान हैं. महाराष्ट्र के बाद एमपी का नंबर आता है जहां 11864 महिला प्रधान हैं. दक्षिण भारत का आंध्र प्रदेश भी इस सूची में चौथे नंबर पर है जहां 6534 महिला प्रधान हैं. आंध्र प्रदेश के बाद छत्तीसगढ़ का नंबर आता है जहां 5822 महिला प्रधान हैं.

पीएम मोदी का गृहराज्य गुजरात इस सूची में 7वें नंबर पर है जहां 4676 महिला सरपंच हैं. यूपी का पड़ोसी राज्य बिहार इस सूची में 13वें नंबर आता है जहां 3772 महिला प्रधान हैं. लिंगानुपात को लेकर चर्चा में रहने वाला हरियाणा सूची में 15वें नंबर पर है और यहां 2565 महिला सरपंच हैं. वहीं देश का सबसे साक्षर राज्य सूची में 18वें नंबर पर है और यहां 471 महिला सरपंच हैं.

इन आंकड़ों में ध्यान देने वाली बात ये है कि यूपी और महाराष्ट्र में पंचायतों की संख्या भी काफी ज्यादा है. इसलिए हम सीधे तौर पर यूपी और केरल की तुलना नहीं कर सकते लेकिन फिर भी यूपी जैसे पिछड़े राज्य में इतनी महिला प्रधान होना सुखद है. बिहार के आंकड़े इस मामले में चिंताजनक हैं. जहां पंचायतों की संख्या ज्यादा होने के बावजूद महिला प्रधानों की संख्या काफी कम है.

पंचायती में महिलाओं के इस प्रतिनिधित्व के जरिए महिला सशक्तिकरण तलाशनें पर एक तस्वीर और सामने आ सकती है. इनमें से तमाम पंचायतें ऐसी होंगी जो महिलाओं के लिए आरक्षित ही होंगी. गांव में कुछ ऐसे प्रभावशाली पुरूष भी होते हैं दो किसी कारणवश चुनाव नहीं लड़ सकते. बताए गए दोनों में अधिकतर में महिलाएं महज डमी उम्मीदवार और अगर चुनाव जीत गईं तो डमी प्रतिनिधि भी होती हैं. प्रधानपति या प्रधान प्रतिनिधि के तौर पर इन महिलाओं के संबंधी पुरुष पूरा शासन चलाते हैं. बड़ी बात नहीं कि गावं अपनी प्रतिनिधि का चेहरा भी देख पाएं क्योंकि पूरानी परंपरा के अनुसार घूंघट डालें रहती हैं. ऐसे में महिला सशक्तिकरण कितना है ये आप जान सकते हैं. फिर भी आजादी के इतने सालों बाद आखिर हम यहां तक ही पहुंच गए इसलिए खुद की पीठ थपथपा सकते हैं.