देश में दलित राजनीति लंबे वक्त से होती आई है. कांशीराम ने इस राजनीति को नया आयाम दिया. उनके बाद मायावती ने बीएसपी और दलित राजनीति की विरासत को आगे बढ़ाया. हाल के वक्त में भी दलित नेताओं की कमी नहीं है. इन नेताओं में कुछ ऐसे भी हैं जो दलित राजनीति के नाम पर हिंसा तक की बात करते हैं लेकिन दलित राजनीति के इस कथित स्वर्णिम दौर में भी दो घटनाएं जिस तरह से घटीं और उनके बाद जिस तरह का रिएक्शन आज के दलित नेताओं का रहा, वो इनकी सियासत के खोखलेपन को उजागर करता है.

पहली घटना एमपी के शिवपुरी जिले की है. यहां सिरसौद थाना क्षेत्र के भावखेड़ी गांव में दो बच्चों की पीट पीटकर हत्या कर दी गई. इन बच्चों का जुर्म इतना था कि वो खुले में शौच करने गए थे. हत्या के आरोपियों ने पहले इन्हें धमकाया कि खुले में शौच क्यों कर रहे हो और उसके बाद लाठी डंडों से पीट पीटकर हत्या कर दी. मरने वालों में बच्चों रोशनी और अविनाश की उम्र महज 12 और 10 साल है. दोनों बच्चे दलित जाति वाल्मिकी के थे. इनका परिवार गांव में एक झोपड़ी बनाकर रहता था. इनके पिता का दावा है कि पंचायत में मकान बनवाने के लिए पैसा आ गया था लेकिन आरोपियों के प्रभाव से ही उनका मकान नहीं बन पाया.

दूसरी घटना यूपी के हरदोई जिले की है. यहां प्रेम प्रसंग में एक शख्स को जलाकर के मार दिया गया. यहां भी मृतक दलित जाति से था. आरोपियों ने मृतक युवक को परिवार की लड़की के साथ देखा. उसके बाद युवक को चारपाई में बांधकर जिंदा जला दिया गया.

अभी के वक्त में देश में मायावती सबसे बड़ी दलित नेता हैं. वो यूपी की सीएम रही हैं. बहुमत के साथ उन्होंने सरकार चलाई है. यूपी में दलित आज भी इन्हें वोट करते हैं और एमपी में भी इन्हें समर्थन मिलता है. वहां भी इनके विधायक हैं. मायावती जी फिलहाल खाली हैं. इनके पास कोई प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं है. ऊपर जिन घटनाओं का जिक्र हुआ है, उनके बाद मायावती जी ने ट्वीट किए . दोनों जगहों की सरकारों पर हमला बोला. उनके इस हमलों को मीडिया में जगह भी मिली, मगर एक विपक्ष के नेता की प्रतिक्रिया से ज्यादा ये कुछ नहीं था. मायावती जी की इन घटनाओं के बाद कितनी गंभीरता से ट्वीट कर रहीं थीं, ये उनके ट्वीट की जानकारी को पढ़कर पता चलता है.

एमपी की घटना के बाद जो ट्वीट किए, उनमें दो दलित युवकों शब्द का इस्तेमाल किया गया है. जबकि एमपी में मरने वाले दो बच्चे थे इनमें भी एक बच्ची थी. मायावती जी को जानकारी कौन दे रहा था, इस घटना की गहराई में जाने का उन्होंने कितना प्रयास किया, ये उनके ट्वीट देखकर पता चलता है. देश की राजनीति में हाशिए पर चल रहीं इतनी बड़ी दलित नेता से उम्मीद की जाती है कि वो कम से कम घटनास्थल पर जातीं और पीड़ित परिवारों से मिलतीं और सरकारों पर दबाव बनातीं कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हो. मगर मायावती जी इतनी बड़ी नेता बन चुकी हैं कि महज ट्वीट से ही वो विरोधियों को पस्त कर सकती हैं. उन ट्वीट में जानकारी भी गलत पड़ी हो तो भी मायावती जी को कोई फर्क नहीं पड़ता.

देश में दलितों के एक और मसीहा हैं. भारतीय राजनीति के मौसम वैज्ञानिक कहे जाने वाले रामविलास पासवान अभी केंद्र में मंत्री हैं. मंत्री जी और अभिनेता से नेता बने उनके बेटे दलित राजीनीति पर बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेकिन उनके पास एक ट्वीट भी करने का वक्त नहीं था. यूपी की घटना पर इनकी चुप्पी समझ भी आती है. आखिर यहां इनकी वरिष्ठ पार्टी की सरकार है लेकिन एमपी में तो विपक्षी पार्टी सत्ता में है लेकिन राजनीति का मौसम वैज्ञानिक जानता है कि मौसम कभी भी बदल सकता है. इसलिए शांत रहना बेहतर है.

ये तो बात हुई बड़े नेताओं की. इनके अलावा देश में दो और बड़े दलित नेता हैं. दोनों दलित राजनीति के नाम पर हिंसा की बात भी करते हैं. ये दोनों ही भारतीय उदारवादियों के प्रिय हैं. इनमें से एक हैं गुजरात से विधायक जिग्नेश मेवाणी और दूसरे चंद्रशेखर उर्फ रावण. जिग्नेश तो इतने बड़े दलित नेता हैं कि इतना काफी वक्त दिल्ली के कथित उदारवादियों के बीच बीतता है. और दूसरे महोदय रावण जी अपनी मूंछों पर ताव देकर जेल की हवा भी खा चके हैं. जिग्नेश जी ने अपने उदारवादी मित्रों के समान ही काम किया. ट्विटर पर ट्वीट किया और जय भीम का नारा लगाकर आंदोलन करने की बात कही. किसी को इन्हें बताना चाहिए कि आंदोलन जमीन पर होते हैं जहां फिलहाल आप नजर नहीं आ रहे. हो सकता है जिग्नेश ट्विटर की हवा में ही आंदोलन की तैयारी कर रहे हों. दूसरे चंद्रशेखर रावण जी कहीं भी नजर नहीं आए. वो ट्विटर पर सक्रिय नहीं हैं और हो सकता है कि उनकी प्रतिक्रिया मीडिया में न आ सकी हो. वैसे उनकी प्रतिक्रिया इतनी जबरदस्त होती है कि छिप नहीं पाती. इतने बड़े अत्याचारों के बाद तो वो आग चुके हैं.

इन कथित दलित नेताओं के अलावा देश में दलितों के हमदर्दों की कमी नहीं है. जो अक्सर दलितों का नाम लेकर कभी किसी पार्टी तो कभी किसी जाति को अपशब्द तक कहते रहते हैं. फिलहाल सभी शांत हैं. बच्चों की मौत पर भी जो शांति नहीं टूटी आखिर वो कब टूटेगी ? जब इन राज्यों में चुनाव होंगे तब ?