दिल्ली के जाफराबाद में कल हिंसा हुई. जामिया के बाद जाफराबाद दिल्ली का वो इलाका है जो हिंसा का शिकार हुआ है. जामिया में हिंसा के बाद पुलिस कार्रवाई की काफी निंदा हुई, बहुत से लोगों ने कार्रवाई का समर्थन भी किया. वहीं जाफराबाद में पुलिस की कार्रवाई की कोई बात नहीं हुई. थोड़े टकराव के बाद मौलवियों से बात करके और मदरसे से डीसीपी की शांति की अपील के बाद इलाके में कुछ शांति हुई.

जामिया में पुलिस कार्रवाई की कई लोगों ने आलोचना की. कहा गया छात्रों को बेरहमी से पीटा गया. दरअसल हमारे समाज की एक सोच है. हम किसी घटनाक्रम का सिर्फ अंतिम पहलू देखते हैं. हमने वो अंतिम पहलू देखा कि छात्रों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया. आंसू गैस के गोले छोड़े लेकिन उससे पहले के दृश्य को हमने नजरअंदाज कर दिया. भारत में पुलिसकर्मियों की भूमिका हमेशा संदेह में रहती है. कारण भी है आमतौर पर सामान्य अपराधों में पुलिस लापरवाही दिखाती है. आमतौर पर पीड़ितों को ही परेशान करती है. इसीलिए पुलिस को कठघरे में खड़ा करना आसान हो जाता है. कहा जा सकता है कि पुलिस अपनी छवि के लिए खुद जिम्मेदार है लेकिन दिल्ली में जामिया का मामला अलग है.

प्रदर्शनकारियों ने बसें जलाईं. पेट्रोल बम फेंके, पुलिस पर भी पथराव किया. पथराव इतना बुरा था कि वक्त में कश्मीर की पत्थरबाजी याद आ गई. वही नकाबपोश लोग, गुस्से में पत्थर फेंकते लड़के. पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े.शुरुआती घटनाक्रम में इन दंगाईयों ने हालात को झकझोर दिया. जब पुलिस ने कार्रवाई की तो ये लोग जामिया यूनिवर्सिटी में घुसे. उसके अंदर से भी पुलिस पर पथराव किया. पुलिस के लिए हालात नियंत्रण से बाहर थे. अगर वाकई आप जामिया में हिंसा का सच देखना चाहते हैं तो सोशल मीडिया को छोड़ें और 16 दिसंबर को हुई इस घटना पर किसी चैनल पर लाइव रिपोर्टिंग देखें. हालात इतने बदतर थे कि पुलिस को यूनिवर्सिटी के अंदर घुसना पड़ा और कृपया कोई ये न कहे कि पुलिस कैंपस में बगैर इजाजत कैसे घुसी? जामिया या कोई भी यूनिवर्सिटी भारत के संविधान के दायरे में ही आती है और जब इससे जुड़ी किसी घटना से भारत की संप्रुभता को खतरा होगा तो पुलिस जरूर घुसेगी. उसके बाद पुलिस कैंपस में गई और कार्रवाई की.

दंगों और इस तरह की हिंसा का सच सिर्फ एक होता है, ऐसी हिंसा में सबसे ज्यादा नुकसान निर्दोषों का ही होता है. शायद यही वजह है कि आमतौर पर मां बाप अपने बच्चों को ऐसे प्रदर्शनों में जाने से रोकते हैं. जामिया में हिंसा के मामले में ऐसा हो सकता है. तमाम निर्दोष छात्र भी घायल हुए होंगे लेकिन सवाल उठता है कि दिल्ली पुलिस यूनिवर्सिटी में घुसने के बाद फर्क कैसे करेगी. जो गलत काम करके छिपने आया है, उसे यूनिवर्सिटी में घुसने देना भी गलत है. जामिया में पुलिस कार्रवाई के बाद हालात काबू में आ गए. ये बताता है कि दिक्कत जामिया कैंपस से ही थी. भले ही पथराव और आगजनी करने वाले छात्र न हों लेकिन कहीं न कहीं इन्हें छात्रों से समर्थन था. ऐसे में पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाना गलत है.

अब जाफराबाद पर आते हैं. जो लोग जामिया में पुलिस पर सवाल खड़े कर रहे हैं, उन्हें जाफराबाद के वीडियो देखने चाहिए. किस तरह से पुलिस और स्कूल बस तक को निशाना बनाया गया. दंगाईयों ने पुलिस को दौड़ाया, पत्थरबाजी की. पुलिस ने यहां भी कार्रवाई की. खैरियत ये है कि यहां छात्रों की आड़ में कोई बच नहीं सकता था. हालांकि पुलिस ने बड़ी संयमता से हालात को नियंत्रण में लिया.

इस मूल में है नागरिकता कानून. मुसलमानों में यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि आपको देश से निकालने की साजिश रची जा रही है. जबकि नागरिकता कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. भारत के सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि लोगों के दिमाग से यह भ्रम निकाला जाए. लोगों की लाशों के ऊपर किसी को भी राजनीति करने की इजाजत नहीं दी जा सकती. आज ये दिल्ली में फैला है, कल को किसी ऐसे इलाके में हो सकता है जहां पर पुलिस कम हो. ऐसे में लोगों को जानमाल का बड़ा नुकसान हो सकता है. जरूरी है कि जो अफवाहें फैलाई जा रही हैं उनसे देश को बचाया जाए.