बीते दिनों जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया गया. जिसके बाद जम्मू कश्मीर को लेकर तमाम चर्चाएं हो रही हैं. सबसे बड़ा सवाल है कि कश्मीर के लोग इस बड़े पर किस तरह का रिएक्शन देंगे. सरकार की तरफ से कोशिशें जारी हैं. पीएम मोदी ने पहले एक संबोधन के जरिए जम्मू कश्मीर के लोगों को विश्वास में लेने की कोशिश की और उसके एनएसए अजीत डोभाल के कश्मीर घाटी के वीडियो भी लोगों ने देखे. दिख रहा है कि सरकार कोशिश कर रही है कि कश्मीर घाटी के लोगों को विश्वास में लिया जाए कि कैसे अनुच्छेद 370 हटाना उनके हित में है ?

इसी बीच बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट में डोभाल के वीडियो की अलग ही व्याख्या की गई है. इसमें लिखा गया है कि डोभाल के वीडियो महज ये दिखाने के लिए हैं कि जम्मू कश्मीर में हालात सामान्य है. बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट को भी पढ़ा जाना चाहिए ताकि पता चल सके कि सच दिखाने के नाम पर कैसे लोगों को भड़काने का काम किया जाता है. बीबीसी के मुताबिक कश्मीर घाटी के अलग अलग हिस्सों में प्रदर्शन हो रहे हैं. पत्थरबाजी भी हो रही है और लोगों को हिरासत में भी लिया जा रहा है. एनडीटीवी की एक रिपोर्ट पर तो खासा विवाद हुआ. इसके मुताबिक एक शख्स ने एनडीटीवी के रिपोर्टर से कहा कि कर्फ्यू हटा लें फिर देखे कि विरोध कैसे होता है ? इस रिपोर्ट के बाद एनडीटीवी को सफाई भी देनी पड़ी.

द वायर भी इसी तरह की खबरों को प्रमुखता से दिखाने की कोशिश कर रहा है. इसी बीच कुछ अन्य चैनलों की भी रिपोर्टिॆग भी नजर डालें तो एबीपी न्यूज की रिपोर्ट में कश्मीर में हालात सामान्य दिखे. लोगों की भीड़ भी दिखी और शांति भी. एक इलाके में तो ट्रैफिक जाम के हालात थे. बकरीद का त्योहार आने वाला है और लोग उसकी तैयारी करते भी नजर आए. इससे पहले जुमे की नमाज के लिए भी कर्फ्यू में ढील दी गई थी. आमतौर पर इस नमाज के बाद कश्मीर में हालात खराब होते थे लेकिन इस बार शांति रही और कोई गलत घटना सामने नहीं आई. बीबीसी और एनडीटीवी ने भी ऐसी कोई खबर नहीं दी. हालांकि कश्मीर में कर्फ्यू अभी भी जारी है. संचार सेवाएं और तीन सरकारी चैनलों को छोड़कर बाकी चैनल भी बंद हैं.

हिंसा और शांति की खबरों पर दो पक्ष हैं. पहला कि कश्मीर घाटी में इस्लाम के नाम पर लोगों को गुमराह किया जा चुका है. कश्मीर की आजादी के नाम पर शुरू हुआ कथित आंदोलन अब इस्लामी उग्रवाद की चपेट में है और यही वजह है कि यहां के अलगाववादी पाकिस्तान के गुण गाते हैं और उसके साथ जाने की वकालत करते हैं. कश्मीर के लोगों के दिमाग में यह घुसा हुआ है और यही वजह है कि वहां प्रदर्शन होते रहे हैं. पत्थरबाजी होती रही है और भारत से आजादी के नारे लगे हैं. ये सब हाल फिलहाल भी होता आया है. कश्मीर के इस तबके से अनुच्छेद 370 हटाने पर शांति की उम्मीद करना बेईमानी है. बीबीसी और एनडीटीवी बेशक अपनी पत्रकारिता के नाम पर इसे दिखाएं लेकिन इसमें कुछ भी नया या क्रांतिकारी नहीं है. भारत सरकार और आम लोग भी ये बात जानते हैं. आखिर जम्मू कश्मीर में सेना को बड़ी मात्रा में इसीलिए तैनात भी किया गया है ताकि वहां शांति रह सके.

कश्मीर का ये तबका आज नहीं तो कल भड़केगा. जो लोग दिल्ली में बैठकर इस इंतजार में हैं वो खुश हो सकते हैं लेकिन इससे सिवाय नुकसान के कुछ नहीं हासिल होने वाला है. लोग मारे जाएंगे, घायल होंगे यह तय हैं. इस समस्या का दरअसल कोई इलाज नहीं है. भारत ने अनुच्छेद 370 हटाकर कड़ा संदेश दिया है. जम्मू और कश्मीर की अधिकतर जनता इसे मानेगी भी. इन मुठ्ठी भर लोगों को समझना चाहिए कि आपका भविष्य भारत के साथ ही है. यहां अंग्रेजों की तरह आप पर अत्याचार नहीं हो रहे. जब जम्मू कश्मीर में बाढ़ आती है तो आपको मरने के लिए नहीं छोड़ा जाता बल्कि बचाया जाता है. इसलिए जरूरी है कि ये लोग खुद की सोच सुधारें औैर बजाय किसी के भड़कावे में आने के शांति से रहें और लोगों को भी रहने दें.

दूसरा शांति की खबरें दिखाने का मकसद साफ है कि लोगों को सकारात्मक संदेश दिया जाए. कश्मीर के जो हिस्से हिंसा से प्रभावित रहे हैं लेकिन अभी वहां शांति है, उनके बारे में लोगों को बताया जाए ताकि जो लोग गडबड़ करना चाह भी रहे हों उनकी हिम्मत कमजोर पड़े. दुनिया के बीच भी एक सकारात्मक संदेश जाए आखिर हिंसा से कश्मीर की छवि भी तो प्रभावित हुई है. क्रांतिकारी लोग इस पत्रकारिता को सरकारी बताकर इसकी खिल्ली उड़ा सकते हैं लेकिन इसकी एक अहमियत है. कोई भी सरकार लोगों का खून अपने मत्थे पर चढ़ाना नहीं चाहती. कश्मीर पर पूरी दुनिया की नजर है और पीएम मोदी ने अपनी और भारत दोनों की छवि को दांव लगाया है. सरकार पर भरोसा रखिए वो यूहीं खुद की छवि को खराब नहीं होने देगी. उम्मीद यही की जा सकती है कि कश्मीर में शांति रहे और लोग अपनी बात रखें भी तो तरीका शांतिपूर्ण हो.