इन दिनों बात भारत की सियासत की हो रही हो तो पप्पू और चाणक्य से हम कैसे भाग सकते हैं.दोनों ही भारतीय राजनीति में इन दिनों बखूबी जानी जाने वाली परिकल्पनाएं हैं.सवाल ये है की परिकल्पनाएं किसकी बनाई हुईं हैं और क्या दुनिया के सबसे बड़े कथित लोकतंत्र में इनके इस्तेमाल की शुरूआत करने वालों ने जरा भी अपने दिमाग पर जोर डाला था.ये सवाल इसलिए क्योंकि दोनों परिकल्पनाएं दो व्यक्तियों से जुड़ती हैं.दोनों व्यक्तियों से जुड़ने के साथ ही इनका एक व्यापक फैलाव होता है और इसके बाद तमाम लोग प्रभावित होते हैं.चूंकि ये मामला गंभीर है इसलिए हम दो अंकों में अपनी बात पूरी करेंगे.पहले अंक में बात करेंगे 'पप्पू' की.

बीते दिनों तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत के बाद फारूक अब्दुल्ला ने कहा की राहुल गांधी अब पप्पू नहीं रहे.अब बात पप्पू की हो रही है तो आपको एक किस्सा सुनाता हूं.बचपन से अपने एक पप्पू नाम के पड़ोसी को देख रहा हूं.पिता की जल्दी मौत के बाद उसने पारिवारिक धंधे को संभाला.पूरे परिवार को संभाला.एक संपन्न व्यक्ति के तौर पर पहचान बनाई.उसके कई जानने वाले(शायद वो उससे जलते हों) उसे बेहद चालाक और धूर्त बताते हैं. कुल मिलाकर ये पप्पू राहुल गांधी जैसा बिल्कुल भी नहीं है.मैं ऐसे तमाम पप्पुओं को जानता हूं जो अपने जीवन में अपने हालात में बेहद सफल हैं.

जब जब मैं राहुल गांधी को देखता हूं तो उनके लिए इस्तेमाल होने वाली पप्पू नाम की परिकल्पना बेहद घटिया नजर आती है.ऐसा लगता है की मानो उन तमाम सफल पप्पुओं के ऊपर एक राहुल गांधी की असफलताओं को डाला जा रहा है.कई बार मैं उन पप्पुओं से पूछना भी चाहता हूं की जब राहुल गांधी को मूर्खता के संदर्भ में पप्पू कहा जाता है तो आप लोग कैसा महसूस करते हैं,लेकिन फिर उन लोगों की सफलता को देखकर ये प्रश्न अनायास ही खत्म हो जाता है.खैर फारूक अब्दुल्ला के बयान के बाद सभी पप्पुओं को एक सम्मेलन करके अब्दुल्ला सहाब पर या तो मानहानि का दावा ठोकना चाहिए अन्यथा माफी की मांग करनी चाहिए.

आप सोच रहे होंगे यहां अब्दुल्ला की बात ही क्यों हो रही है.दरअसल भारतीय राजनीति में विरोध के चक्कर में फूहड़ बयानी अब बेहद आसान है ऐसे में विपक्ष की तरफ से ऐसे बयान आना हैरान नहीं करता लेकिन अब्दुल्ला ने सहयोगी होते जिस संदर्भ मे राहुल गांधी के लिए पप्पू शब्द का इस्तेमाल किया वो राहुल गांधी के कमजोर और असफल होने की एक स्वीकरोक्ति नजर आती है.

वैसे राहुल गांधी के लिए पप्पू शब्द के इस इस्तेमाल की शुरूआत सोशल मीडिया से हुई.मुख्तार अब्बास नकवी टाइप बीजेपी नेता इसे समय़ समय पर हवा देते रहे.मेनस्ट्रीम मीडिया की अपनी सीमाएं हैं और कथित नैतिकता भी इसलिए तो कम से कम वो वहां इसके इस्तेमाल से दूर रहे.लेकिन ट्विटर और फेसबुक पर तमाम एंकरो और पत्रकारों ने भी इस पप्पू नाम की मानहानि को खूब हवा दी.

इस पूरे मामले में एक सकारात्मक बात बस यही है की राहुल गांधी को पप्पू बताने की परिकल्पना सोशल मीडिया पर रची गई जहां से तमाम विसंगतियों का जन्म हुआ है. लेकिन अमित शाह को चाणक्य बताने की परिकल्पना,वो तो.....

(पढ़िए अगले अंक में)