कोरोना वायरस से इस समय पूरी दुनिया परेशान है. कोरोना ने दुनिया के बड़े बड़े शक्तिशाली देशों में भी तबाही मचा दी है. लगातार लोगों की जानें जा रही हैं. भारत में भी इसके असर को देखते हुए पीएम मोदी ने 21 दिनों के लॉकडाउन का ऐलान किया है. ये पहली बार नहीं है जब दुनिया किसी बीमारी की वजह से परेशान है. पहले भी कोरोना जैसी महामारी दुनिया में फैल चुकी हैं. ये तथ्य जरूर है कि आज के वक्त में विज्ञान के विकास के दौर में बीमारी का फैलना थोड़ा आश्चर्य पैदा करता है. कोरोना ने भारत और पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ा सवाल खडा कर दिया है. कोरोना जैसी ही एक और महामारी प्लेग ने भी कुछ सालों पहले ऐसी ही तबाही मचाई थी. भारत को प्लेग के प्रकोप का सामना कई बार करना पड़़ा. भारत में 1994 में आखिरी बार प्लेग फैला था.आज हम प्लेग के बारे में ही बात करेंगे.

प्लेग की बीमारी "येरसीनिया पेस्टिस" नामक एक बैक्टीरिया के संक्रमण से होती है. प्लेग दो तरह के होते हैं -- न्यूमॉनिक और ब्यूबॉनिक. ब्यूबॉनिक प्लेग चूहों के शरीर पर पलने वाले पिस्सुओं के काटने की वजह से फैलती है.ये बीमारी केवल मरीज के संपर्क में आने से तो नहीं होती लेकिन मरीज के घावों से निकले द्रव्यों के सीधे संपर्क में आने से ब्यूबॉनिक प्लेग हो सकता है.हालांकि न्यूमॉनिक प्लेग ज्यादा खतरनाक है. ये बीमारी रोगी के सीध संपर्क में आने से उसकी सांसों या खांसी से निकले बैक्टीरिया के संक्रमण से हो सकता है.प्लेग की बीमारी पनपने में एक से सात दिन का वक्त लग सकता है.

प्लेग की शुरुआत यूरोप में 1346 में हुई. उस समय प्लेग ने 1353 तक यूरोप और मिडिल ईस्ट में तबाही मचाई. नॉर्वे के इतिहासकार ओले जॉर्गन बेनेडिक्टो अपनी किताब 'द कंप्लीट हिस्ट्री' में लिखते हैं कि 1346 से 1353 के बीच यूरोप की 50 से 60 फीसदी आबादी प्लेग से मारी गई थी. बेनेडिक्टो लिखते हैं कि प्लेग ने इसके बाद लगभग 4 शताब्दियों तक लगभग हर 10 साल में यूरोप में तबाही मचाई.

बेनेडिक्टो के मुताबिक प्लेग से यूरोप में आखिरी तबाही फ्रांस में 1720-21 के बीच में हुई. इसके बाद यूरोप में इसका प्रभाव नहीं दिखा लेकिन भारत में इसकी एंट्री 1896 में हुई. मुंबई में प्लेग की शुरुआत हुई. मुंबई म्युनिसिपल के कमिश्नर ने आदेश दिया कि जितने भी संक्रमित लोग हैं उनको अस्पताल में इलाज के लिए भेजा जाएगा और संक्रमित घरों को खाली करवाकर सफाई करवाई जाएगी. इस आदेश के बाद मुंबई में लोग परेशान हो गए. लोग मुंबई छोड़कर दूसरे शहरों में जाने लगे. इनमें से बहुत से प्लेग से संक्रमित थे. 29 अक्टूबर को मिल मजदूरों के एक समूह ने एक अस्पताल पर हमला कर और पुलिस ने उन्हें तितर बितर किया.उस वक्त के अधिकारी ने लिखा है, "मुंबई की सड़कें रेगिस्तान जैसी हो गईं थीं. पूरे के पूरे परिवार प्लेग से मारे गए. ये लोग कौन थे, कहां से आए थे, किसी को इसकी जानकारी नहीं थी. बीमार मां अपने बच्चों को बीमारी के डर की वजह से उठा तक नहीं पा रही थीं.कारोबार एकदम ठप पड़ चुका था." अगस्त 1897 तक मुंबई में प्लेग से 10 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी थी.

महाराष्ट्र के पुणे में इसी प्लेग की आड़ में अंग्रेजों ने भारतीयों पर अत्याचार किए. प्लेग कमिश्नर वाल्टर चार्ल्स रैण्ड के अगुआई में भारतीयों को प्रताड़ित किया गया. इसके बाद दामोदर हरि चाफेकर नाम के एक क्रांतिकारी ने रैंड की गोली मारकर हत्या कर दी गई. दरअसल भारत में प्लेग से मरने वालों की ज्यादा संख्या के पीछे अंग्रेजों का खराब प्रशासन भी था.

1994 में भारत में प्लेग ने एक बार फिर से बड़ी तबाही मचाई. गुजरात के सूरत में 25 सितंबर 1994 को प्लेग से कई मौतों की खबर आई. लोग उस वक्त भी घबरा गए और सूरत छोड़कर भागने लगे. प्लेग में इलाज में टेट्रासाइक्लिन नाम की एक एंटीबायोटिक इस्तेमाल की जाती थी. लोगों ने इसकी अंधाधुंध खरीददारी की और दवाई की दुकानों से ये एंटीबायोटिक गायब हो गई. सूरत, मुंबई, दिल्ली हर जगह ये दवाई गायब हो गई. अफवाह उड़ी की सूरत को आइसोलेट किया जाएगा. ऐसे में 4 लाख से 6 लाख लोग सूरत छो़ड़कर रवाना हो गए. इनमें से तमाम लोग प्लेग से संक्रमित थे. तमाम डॉक्टर और फार्मासिस्ट अपने परिवार और दोस्तों के लिए तमाम दवाईंयां लेकर भाग गए. उस वक्त तमाम रेलवे स्टेशन पर जांच के लिए टीमें लगाई गईं ताकि बाहर से आने वाले लोगों की जांच की जांच की जा सके. उस वक्त 45 हजार से ज्यादा विदेशियों ने भारत यात्रा कैंसिल कर दी. तमाम देशों ने अपने नागरिकों को भारत यात्रा ना करने की एडवाइजरी जारी की. द हिंदू के मुताबिक प्लेग से उस वक्त भारत की अर्थव्यवस्था को 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ और सूरत में 56 लोगों की मौत हुई थी. बाकी देश में उस वक्त मौतों का आंकड़ा कहीं उपलब्ध नहीं है.