जब भारत के सबसे ताकतवर लोग आपकी सरकार गिराने को ठान लें तो यह कह पाना मुश्किल है कि सरकार कितने दिन बचने वाली है, लेकिन फिर भी अगर कोई इनके सामने अकेले दम पर अपनी सरकार बचा ले, तो वाकई उस शख्स में कुछ तो खास बात है. बीते दिनों राजस्थान बड़ी सियासी उठापटक से गुजरा. डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत कर दी. कुछ विधायकों के साथ सचिन पायलट दिल्ली आ गए और माना जाने लगा कि राजस्थान की कांग्रेस सरकार अब चंद दिनों की ही मेहमान है. एमपी में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत के बाद सरकार गिर चुकी थी और राजस्थान भी बीजेपी की पकड़ से दूर नजर नहीं आ रहा था. ऐसे में राजनीति के जादूगर कहे जाने वाले सीएम अशोक गहलोत अपनी बिसातें बिछाने में लगे हुए थे.

राजस्थान के सियासी संकट की वजह से सवाल कांग्रेस नेतृत्व पर भी उठे और सीएम अशोक गहलोत पर भी. माना गया कि अशोक गहलोत 69 साल की उम्र में भी सीएम पद का मोह नहीं छोड़ पा रहे. सचिन पायलट विधानसभा चुनाव के वक्त प्रदेश अध्यक्ष थे और उनके नेतृत्व में पार्टी को बड़ी जीत भी मिली थी. पायलट की जगह गहलोत को सीएम बनाने से संदेश गया कि पार्टी युवाओं पर बुजुर्गों को तरजीह दे रही है. लोगों ने इसका यह भी मतलब निकाला कि कांग्रेस में उन लोगों को जानबूझकर पीछे धकेला जा रहा है जो आने वाले वक्त में राहुल गांधी के लिए चुनौती बन सकते हैं. पायलट वर्सेज गहलोत के इस मुकाबले में पायलट के लिए लोगों के दिल में सहानूभूति थी. युवा चेहरा हमेशा एक आशा और आकर्षण पैदा करता है और पायलट को इसका फ़ायदा बखूबी मिल रहा था.

राजस्थान के कोटा में एक अस्पताल में बच्चों की मौत हुई. राष्ट्रीय मी़डिया में मामला काफी चर्चा में आ गया. ऐसे में सीएम गहलोत का एक विवादित बयान भी चर्चा में रहा. गहलोत ने बयान देते हुए कहा था, "बीजेपी शासन के दौरान 1 साल में 1600 से ज्यादा बच्चों की मौतें होती थीं, जिसे हम कम करके 900 के आंकड़े पर ले आए हैं." सीएम के इस बयान की चौतरफा आलोचना हुई. इसके बाद डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने कोटा के उस अस्पताल का दौरा किया. अस्पताल के दौरे के बाद बाद सचिन पायलट ने बगैर नाम लिए अशोक गहलोत पर निशाना साधा. पायलट ने कहा, "इस पूरे मामले पर हमारी कार्रवाई किसी हद तक संतोषजनक नहीं है. ये मैं इसलिए कह रहा हूं कि आंकड़ों के जाल में हम चर्चा को ले जाएं, ये उन लोगों को स्वीकार्य नहीं है जिन्होंने अपने बच्चें खोए हैं. जिस मां ने 9 महीने अपने बच्चे को पेट में रखा है, जब उसकी कोख उजड़ती है तो उसका दर्द वही जानती है.एक साल से हम लोग शासन चला रहे है तो हमारी जनता के प्रति जवाबदेही है और हमारी जिम्मेदारी बनती है और मैं इतने सारी मौतों से बहुत आहत हूं ओर यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि किसी की गलती थी या नहीं."सचिन पायलट से उस वक्त पूछा गया कि कांग्रेस आलाकमान इस पूरे मामले को कैसे देखता है. पायलट ने जवाब दिया,"कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस मामले को लेकर बहुत चिंतित हैं." पायलट के इस बयान के बाद दिल्ली में कांग्रेस की राजनीति कवर करने वाले पत्रकारों ने खबरों में बताया कि सोनिया गांधी, गहलोत सरकार के तौर तरीके से नाराज थीं और पायलट उनके कहने पर ही अस्पताल गए और ये बयान दिया. इस पूरे मामले में राजस्थान सरकार में गहलोत वर्सेज पायलट की झलक साफ दिखाई दी लेकिन यहां पायलट की युवा और कर्मठ छवि और भी ज्यादा साफ हुई.

राजस्थान के हालिया घटनाक्रम पर कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने एक लेख लिखा है. उन्होंने लिखा है कि भले ही पायलट ने पार्टी को विधानसभा चुनाव में जीत दिलाई लेकिन लोकसभा चुनाव में एक वो पार्टी को एक भी सीट नहीं दिलवा पाए. अय्यर ने ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी जिक्र किया है कि किस तरह वो अपनी गुना लोकसभा सीट से भी चुनाव हार गए. बेशक अय्यर के लेख पर विचार किया जा सकता है लेकिन पायलट और सिंधिया दोनों के पास इसके खिलाफ मजबूत तर्क होंगे. मसलन लोकसभा चुनाव के वक्त राजस्थान में कांग्रेस सरकार बन चुकी थी और सीएम अशोक गहलोत बन चुके थे. दूसरे लोगों का गुस्सा वसुंधरा सरकार के खिलाफ ज्यादा था और मोदी सरकार के खिलाफ लोग कभी गुस्से में नहीं रहें. सिंधिया की बात करें तो वो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी बनाए जा चुके थे और मोदी लहर में अपनी सीट पर कमजोर चुनाव अभियान उन्हें भारी पड़ गया.

उधर अशोक गहलोत की बात करें तो उनके ऊपर आरोप लगे कि वो पूरे लोकसभा चुनाव में अपने बेटे की सीट पर ही केंद्रित रहे. जोधपुर से बेटे को जिताने के लिए उन्होंने बाकी सीटों को नजरअंदाज किया. उनके बेटे वैभव गहलोत चुनाव तो हारे ही साथ ही बाकी सभी सीटों पर भी कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा. इतनी बड़ी हार और आलोचना के बाद भी गहलोत का कद कम नहीं हुआ. पायलट ने भले ही काफी कोशिश की हो लेकिन वो गहलोत को सत्ता की गद्दी से हटान में कामयाब नहीं हो पाए. खबरों की मानें तो इसके उलट गहलोत ने पायलट गुट के मंत्रियों को अपनी तरफ भी शामिल कर लिया. सचिन पायलट, गहलोत की इस चाल से बिल्कुल भी खुश नहीं थे. उन्हें सब कुछ अपने हाथ से निकलता दिख रहा था. दूसरी तरफ एमपी में उनके मित्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तख्तापलट भी कर दिया था. ऐसे में शायद सचिन पायलट ने मौजूदा हालात में कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव पाने की सोची.

राज्यसभा चुनाव के वक्त सचिन पायलट ने बगावत क्यों नहीं कि इसका जवाब शायद वो ही बेहतर दे पाएं. पायलट के बीते दिनों के रवैये को देखें तो पता चलता है कि शुरुआत उन्होंने बड़ी दमदार की. ज्योतिरादित्य सिंधिया से मुलाकात की और चर्चाएं चल पड़ी कि वो बीजेपी में शामिल होने वाले हैं. उनके समर्थक विधायक हरियाणा में मानेसर में एक होटल में रुके थे. जैसा कि कांग्रेस का आरोप था, बीजेपी की हरियाणा सरकार उनकी आगवानी कर रही थी. कोर्ट में सचिन पायलट का पक्ष रखने मुकुल रोहतगी और हरीश साल्वे गए. दोनों को ही बीजेपी समर्थित वकील माना जाता है. दूसरी तरफ पायलट इस बात से इंकार कर रहे हैं कि वो बीजेपी में जाएंगे. ऐसा लग रहा है कि पायलट कन्फ्यूज हैं. शुरुआत में उनके साथ 41 विधायक होने का दावा किया गया था जो कि अब 17-19 बताए जा रहे हैं. पूरे घटनाक्रम पर, अब तक उन्होंने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की या किसी को बाइट नहीं दी.दूसरी तरफ अशोक गहलोत लगातार इंटरव्यू दे रहे हैं. वो पायलट समर्थक विधायकों की संख्या भी बता रहे हैं. उनके मुताबिक पायलट के साथ 19 विधायक हैं. वो राज्यपाल से मुलाकात भी कर चुके हैं. मीडिया के मुताबिक, उन्होंने राज्यपाल से बहुमत साबित करने की बात भी कही है. उनके अंदर वो आत्मविश्वास नजर आ रहा है कि वो सरकार बचा चुके हैं.

गहलोत वर्सेज पायलट का पुराना इतिहास पढ़ने पर पता चलता है कि सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट ने, अशोक गहलोत को बुरी तरह साइडलाइन कर दिया था. काफी समय तक राजेश पायलट के सामने उनकी नहीं चली. फिर भी आज गहलोत राजस्थान की सियासत के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं. गहलोत पिछले विधानसभा चुनाव में गुजरात के प्रभारी थे, जहां कांग्रेस ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी.बीते दिनों, उन्होंने सचिन पायलट के लिए कहा कि उनकी 'रगड़ाई' नहीं हुई है. सचिन पायलट ने बगावत का झंडा उठाया और उसके बाद जिस तरह के कदम उठाए उससे वाकई गहलोत की बात सही मालूम पड़ती है. गहलोत के राजनीतिक जीवन को देखें तो पता चलता है कि पायलट की तरह, गहलोत भी बगावत कर सकते थे लेकिन उन्होंने पार्टी नहीं बदली और अपनी एक जगह बनाई. पायलट चाहते तो इन्हीं गहलोत से सीख सकते थे लेकिन उन्होंने बगावत को चुना. उनके कदम देखकर लगा कि वो जल्दबाजी में आ गए. फिलहाल वो एक असफल विद्रोही मालूम पड़ रहे हैं और गहलोत की बात सही दिख रही है कि 'रगड़ाई' कम होने का असर, उनके एक-एक कदम में नजर आ रहा है.