देश में इस समय कई तरह के प्रदूषण चरम पर है. मसलन उत्तर भारत इस समय साफ ऑक्सीजन तक नहीं ले पा रहा. दिल्ली-NCR ज्यादा प्रभावित है इसलिए वहां की चर्चा ज्यादा है. इसी दिल्ली में वकीलों और पुलिस के झगड़े से एक प्रदूषण पैदा हुआ है. इस प्रदूषण ने देश की न्याय और कानून व्यवस्था पर ही सवाल उठा दिए हैं, तो वहीं देश के पश्चिमी हिस्से के राज्य महाराष्ट्र में सियासत का प्रदूषण है. वहां नई सरकार नहीं बन पा रही. सत्ताधारी गठबंधन के साझेदार ही एक दूसरे की बखिया उधेड़ रहे हैं हालांकि फिर भी लग रहा है कि आखिर हिंदुत्व के धागे की दुहाई देकर ये दोनों फिर एक बार सत्ता की गाड़ी का सफर साथ करेंगे. हम इन तीनों प्रकार के प्रदूषणों पर एक एक करके चर्चा करेंगे.

सबसे पहली बात दिल्ली के हवा वाले प्रदूषण की. पिछले कुछ सालों में इससे उत्तर भारत और राजधानी दिल्ली खासे प्रभावित रहे हैं. सर्दियों की शुरुआत से ही इसका सितम चालू हो जाता है. प्रदूषण की खासियत यह है कि आज तक ये क्यों बढ़ता है और क्यों कम हो जाता है इसका पता ही नहीं चलता. हर साल के प्रदूषण की तरह सरकारों के पास भी रटे रटाए कारण हैं जो जनता को बता दिए जाते हैं. पहला दोष आता है हरियाणा-पंजाब में पराली जलाने वाले किसानों का, फिर दिवाली पर जलाए जाने वाले पटाखों का और फिर गाड़ियों का लेकिन शायद ये तीनों कराण हटा दें फिर भी प्रदूषण बना रहेगा. केजरीवाल जी थोड़ा दोष पंजाब और हरियाणा की सरकारों को देते हैं बाकी अपने कर्तव्य का निर्वाहन ऑड ईवन लागू करके कर देते हैं. केंद्र सरकार हमेशा तो सोती ही रहती थी लेकिन हाहाकार ही इस बार इतना मचा कि उसे जागना पड़ा, फिलहाल केंद्र ने कदम क्या उठाए यह तो पता नहीं लेकिन कुछ मीटिंग जरूर हुई हैं.

दिल्ली के इस प्रदूषण के खेल में मुख्य बात यह है कि किसी का भी ध्यान पेड़ों की कटाई और साल भर धुआं उगलने वाली फैक्ट्रियों पर नहीं जाता. गाड़ी, पराली और दिवाली में जनता भटकी रहती है और सरकार भटकाए रहती है. दिल्ली के आसपास गाजियाबाद, नोएडा और गुरुग्राम में एक जमाने में जंगल था. आज ये सभी इलाके आबादी और उद्योगों से भरे पड़े हैं. आखिर जो नुकसान पेड़ों को काटकर किया गया है उसकी भरपाई की कोशिश कहीं से भी हुई ? जवाब है नहीं, बल्कि फैक्ट्रियों से निकलने वाले कचड़ों ने पर्यावरण को और भी नुकसान ही पंहुचाया है. बीती 3 नवंबर को दिल्ली-NCR की हालत अचानक खराब हुई. अगले ही दिन हालत में अच्छा खासा सुधार हुआ. ऑड-ईवन सुबह लागू हुआ लेकिन तब तक पर्यावरण थोड़ा साफ हो चुका था. जाहिर सी बात है 3 नवंबर दिवाली का अगला दिन नहीं था तो पटाखे तो अचानक से बढ़े प्रदूषण का कारण नहीं थे. पराली भी कारण नहीं था और अगले दिन प्रदूषण खुद कम हुआ. इसका कारण किसी ने भी नहीं बताया. जाहिर सी बात है प्रदूषण की इस समस्या का जवाब हम अब तक ढूंढ ही नहीं पाए हैं. हमें ऑड-ईवन, पराली और दिवाली में फंसाकर मूर्ख बनाया जा रहा है. असली कारण सभी को पता है लेकिन सरकारें वो जरूर कदम ही नहीं उठा रहीं. यकीन मानिए अगले साल इस वक्त तक दिल्ली का यह हाल फिर होगा क्योंकि प्रदूषण को खत्म या कम किए जाने की जरूरत है उस पर न तो अभी कोई कदम उठाए जा रहे हैं और न ही कोई प्लान नजर आ रहा है. दरअसल दिक्कत हमारे अंदर ही है कि हम वोट देने के बाद भूल जाते हैं. पिछले साल से अभी तक किसी ने भी केजरीवाल सरकार से सवाल नहीं किया कि उन्होंने क्या कदम उठाए हैं. जबकि वो विज्ञापन पर पैसा उड़ाकर चिल्लाते रहे कि उन्होंने प्रदूषण कम कर दिया. जरूरत है इन सरकारों के कान में चिल्लाने की ताकि ये दिमाग में आवाज गूंजती रहे कि प्रदूषण भी कोई मुद्दा है.

अब बात करते हैं राजधानी के दूसरे प्रदूषण यानि वकीलों और पुलिसवालों के बीच झगड़े की. अब तक जितने भी वीडियो सामने आए हैं सभी में साफ दिखता है कि वकीलों ने पुलिसकर्मियों की पिटाई की. सिर्फ तीस हजारी कोर्ट में ही नहीं साकेत और अन्य जगहों पर भी ऐसा ही हुआ. ऐसे में दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले पर जो रुख दिखाया उससे पुलिसकर्मियों का नाराज होना स्वाभाविक नजर आता है. पुलिसकर्मियों ने धरना दिया, अपने कमिश्नर की बात नहीं मानी. हालात खराब ही हुए. यह सही है कि पुलिसिया अत्याचार की तस्वीरें हमारे सामने आती रहती हैं लेकिन इसकी सजा सभी पुलिसकर्मियों को नहीं दी जा सकती. कायदा ये था कि ऐसी जांच होती जिससे दोनों पक्षों के गुनहगारों के दंड मिले लेकिन सिर्फ पुलिसवाले ही निशाना बनते नजर आ रहे थे. दिल्ली की सुरक्षा का भार होने के नाते गृह मंत्रालय को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए. आखिर पुलिस वालों को ही अगर न्याय नहीं मिलेगा तो वो कानून व्यवस्था बनाने में कैसे मदद करेंगे.

अब बात करते हैं महाराष्ट्र के राजनीतिक प्रदूषण की. यहां 56 सीटें पाने वाली शिवसेना सीएम का पद चाहती है. वो चाहती है कि उससे लगभग दो गुना ज्यादा सीटें पाने वाली बीजेपी उसके सामने समर्पण कर दे. शिवसेना की यह ख्वाहिश मोदी-शाह तो क्या अटल-आडवाणी वाली बीजेपी भी शायद पूरा न करती. शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत रोज सामना में बीजेपी को गाली देते हैं. टीवी पर भी वो ऐसा करते हुए नजर आते हैं. कभी राज्यपाल से तो कभी शरद पवार से मिलकर बीजेपी पर प्रेशर बनाते हैं फिर भी बीजेपी पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा. अमित शाह पर वैसे भी पूरे देश की जनता को भरोसा है कि वो सरकार तो बनवा ही देंगे तो भला बीजेपी चिंता भी क्यों करे. फिलहाल शिवसेना फंसी हुई नजर आती है. एनसीपी-कांग्रेस के साथ में जाने पर विचारधारा से हटने का धब्बा लगेगा. बीजेपी इसका भी फायदा उठाएगी. सरकार कब तक चल पाएगी इसका भी पता नहीं. खुद के पास बहुमत है नहीं और बीजेपी भी अब टस से मस नहीं हो रही. अब शिवसेना के लिए अच्छा है कि हिंदुत्व के 'धागे' की कथित दुहाई की आड़ में अपनी इज्जत बचाए और चुपचाप महाराष्ट्र में सरकार बना ले.