भारत के बंटवारे से लेकर अब तक बहुत कुछ हो चुका है. बंटवारे को भारत का वो जख्म कहा जाता है जो कभी भी भरा नहीं और वक्त के साथ कभी कभी हरा ही हो जाता है. बीते दिनों में नागरिकता कानून से लेकर NRC तक की बहस ने एक बार फिर भारत को वापस बंटवारे के वक्त में भेज दिया. दरअसल हम कई बार कुछ सवालों के जवाब ढूंढने अतीत में जाते हैं लेकिन हमें जवाब मिलने की बजाय ऐसे ही कुछ सवालों का सामना करना पड़ जाता है, जिनसे हम बचने की कोशिश करते हैं. दरअसल मुस्लिमों ने बीते दिनों CAA और NRC के खिलाफ अपनी दलीलों में कहा कि भारत के मुसलमानों ने बंटवारे के वक्त हिंदुस्तान चुना था, अब उनके साथ गलत व्यवहार हो रहा है. मुसलमानों के इसी दावे को परखने के लिए हम अतीत में गए और जो हासिल हुआ वो आपको बताने वाले हैं.

देश में आजादी और बंटवारे से पहले 1945 में एक चुनाव हुआ था. ये चुनाव अंग्रेजों ने करवाया था. ये आज के भारत में होने वाले किसी आम चुनाव की तरह ही था. अंग्रेजी शासन इस चुनाव में चुनाव आयोग की भूमिका में था. इस चुनाव से पहले मोहम्मद अली जिन्ना टू नेशन थ्योरी दे चुके थे. चुनाव में जिन्ना की मुस्लिम लीग एक दल की तरह लड़ रही थी. जिन्ना की थ्योरी के बाद ये चुनाव दरअसल भारत के बंटवारे के रेफरेंडम बन चुका था. भारत विभाजित होगा या एक रहेगा. जिन्ना के सामने कांग्रेस थी. जिसकी कमान उस वक्त मौलाना आजाद के हाथ में थी. महात्मा गांधी भी कांग्रेस के साथ थे या यूं कहें कि भारत के विभाजन के खिलाफ थे.

इस चुनाव में जो हुआ दरअसल उसके बाद ये तय हो गया कि भारत का विभाजन होगा. दरअसल चुनाव नतीजों में मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग ने बड़ी जीत दर्ज की. सेंट्रल असेंबली की 102 सीटों में से उस वक्त 30 सीटें मुस्लिमों के लिए आरक्षित थीं. इस चुनाव में सभी सीटें मुस्लिम लीग ने जीतीं. सभी मुस्लिमों ने खुलकर जिन्ना का समर्थन किया. गांधी जी के आवाहन और एक मुस्लिम के हाथों में कमान होने के बावजूद मुस्लिमों ने कांग्रेस को ठुकरा दिया. मुस्लिम लीग को 86 फीसदी मुसलमानों का समर्थन हासिल हुआ. चुनाव नतीजों के बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के मुस्लिमों को बधाई दी और पाकिस्तान बनने की दिशा में इसे एक बड़ा कदम बताया. चुनाव में मिले बड़े समर्थन के बाद जिन्ना को वो ताकत मिली जिसके बाद वो भारत के बंटवारे का अपना ख्वाब पूरा कर पाए.

1946 में एक बार फिर देश में प्रांतीय चुनाव हुए. टू नेशन थ्योरी के दम पर यहां भी मुस्लिम लीग ने बड़ी सफलता हासिल की. हालांकि कांग्रेस ने देश के आठ राज्यों में बहुमत हासिल किया लेकिन देश के मुस्लिमों ने एक बार फिर से मुस्लिम लीग को चुना. मुस्लिमों के लिए देश भर में 492 सीटें आरक्षित थीं, इनमें से 429 सीटों पर मुस्लिम लीग ने जीत हासिल की. यूपी में मुस्लिमों के लिए 66 सीटें आरक्षित थीं जिनमें से 54 सीटों पर मुस्लिम लीग मे जीत हासिल की. बिहार में 40 सीटों में से 34 सीटों पर मुस्लिम लीग ने जीत हासिल की. मुंबई में तो जिन्ना ने बड़ी जीत हासिल की और 30 में से सभी 30 सीटें मुस्लिम लीग ने जीत हासिल की. बंगाल में तो मुस्लिम लीग सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. यहां 119 में से 114 सीटों पर मुस्लिम लीग ने जीत हासिल की. इस चुनाव में 89 फीसदी मुस्लिमों ने मुस्लिम लीग का साथ दिया. केवल 4 फीसदी मुस्लिमों ने कांग्रेस का साथ दिया. इन चुनावों के बाद जिन्ना पूरी तरह मुस्लिमों की आवाज बनकर खड़े हो गए.

1945-46 में हुए इन राष्ट्रीय औैर प्रांतीय चुनावों के नतीजों ने देश के बंटवारे की नींव को मजबूती दे दी. जिन्ना की मुस्लिम लीग कांग्रेस को हरा तो नहीं पाई लेकिन अपने मकसद में कामयाब हो गई. जिन्ना को ये कहने का मौका मिल गया कि देश के मुस्लिम उनके साथ हैं और वो देश के बंटवारे के साथ. इस दो चुनावों को देखें तो पता चलता है कि भारत के मुसलमानों का भारत को चुनने जैसा दावा गलत है. भारत को चुनना उनके पूर्वजों की मजबूरी हो सकती है लेकिन भारत से प्यार वो विकल्प नहीं हो सकता. फिर भी जो भारत में हैं वो भारत के नागरिक हैं और इसे कहने में मुस्लिमों को कोई हिचक नहीं होनी चाहिए,लेकिन इतिहास का सहारा लेकर झूठे दावे भी नहीं करने चाहिए.