नक्सल समस्या से बीते समय में हमारा देश बुरी तरह से प्रभावित रहा है. लगातार नक्सली हमलों में नागरिकों और जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. नक्सली हमलों में राजनेता भी बच नहीं पाए हैं और कांग्रेस, बीजेपी और टीडीपी सभी पार्टियों के नेताओं से लेकर अधिकारी तक नक्सली हमलों का शिकार बने हैं. हालांकि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में यूपीए 2 की तुलना में नक्सली घटनाओं में काफी कमी आई है. साथ ही मारे जाने वाले नक्सलियों की संख्या भी बढ़ी है.

दोनों सरकारों में नक्सली घटनाओं की तुलना करें तो इनमें 43.4 फीसदी की कमी आई है. 2009-13 के बीच जहां 8782 नक्सली घटनाएं हुईं वहीं 2014 से 2018 के बीच 4969 नक्सल घटनाएं हुई हैं. अगर नक्सली घटनाओं में मारे जाने वाले नागरिकों की बात करें तो उनकी संख्या में भी कमी आई है. 2009-13 के बीच कुल 2363 लोगों ने नक्सली हमले में अपनी जान गंवाई थी. इस संख्या में 59 फीसदी की कमी आई है और 2014 से 2018 के बीच 967 नागरिकों की नक्सली हमलों में मौत हुई.

नक्सली हमलों में शहीद जवानों के बारे में बात करें तो इसमें भी 63.6 फीसदी की कमी आई है. 2009 से 2013 के बीच कुल 973 जवान नक्सली हमलों में शहीद हुए. अगर 2014 से 2018 के बीच की बात करें तो 354 जवान नक्सली हमलों में शहीद हुए. अगर बात मारे गए नक्सलियों की करें तो इसमें इजाफा हुआ है. 2009 से 2013 के बीच कुल 665 नक्सली मारे गए थे. इस संख्या में 10.5 फीसदी का इजाफा हुआ है. 2014 से 2018 के बीच 735 नक्सलियों को जवानों ने मार गिराया.

ऊपर दिए गए आंकड़ों से पता चलता है कि मोदी सरकार ने नक्सलवाद की समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया है लेकिन समय समय पर होने वाली नक्सली घटनाएं अभी अभी भी बड़े झटके देती हैं. अक्सर बड़ी संख्या में जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ती है इसलिए जरूरी है कि सरकार पूरी तरह से इसके खात्मे के लिए सख्त कदम उठाए