चीन के वुहान से फैली कोविड-19 महामारी दुनिया के सभी देशों के लिए मुसीबत बन गया है। भारत ने संक्रमण के शुरुआती दौर में ही एहतियातन लॉकडाउन लगा दिया था। इसके बावजूद देश में 40 हजार से अधिक लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं। 25 मार्च से जारी देशव्यापी लॉकडाउन को 40 दिन से ज्यादा हो गए हैं। इस दौरान आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह से ठप हैं। इसकी सबसे अधिक मार दूसरे राज्यों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों पर पड़ी है। उन्होंने लॉकडाउन का ऐलान होते ही हजारों किलोमीटर का सफर तय करके घर जाना शुरू कर दिया। हालांकि अभी भी कई राज्यों में बहुत से अप्रवासी मजदूर अनिश्चितता के भंवर में फंसे हुए हैं। दिल्ली के बिजवासन विधानसभा क्षेत्र के समालका और कापासहेड़ा इलाके में भी 100 से अधिक प्रवासी मजदूर परिवार समेत लॉकडाउन के जाल में उलझ गए हैं।

इनमें से अधिकतर उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के रहने वाले हैं। ये रोज कमाकर खाने वाले लोग हैं। लॉकडाउन के चलते काम ठप होने के बाद होने इनके सामने रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो गई है। इन प्रवासी मजदूरों के पास खाने-पीने का सामान खत्म हो गया है और राशन कार्ड न होने की वजह से इन्हें राशन भी नहीं मिल पा रहा है। दिल्ली सरकार 10 लाख लोगों को खाना खिलाने का दावा करती है। हालांकि बिजवासन के लोगों का कहना है कि उन्हें सरकार की ओर से खाना नहीं मिल रहा है। उन्हें दिन में एक बार खाना मिलता है जो कुछ NGO के रहमोकरम पर टिका है।

समालका में रहने वाले कालीचरण (30) बताते हैं, 'मैं उत्तर प्रदेश से काम करने दिल्ली आया था। लॉकडाउन के बाद बहुत से दूसरे लोगों की तरह मेरी आमदनी का जरिया भी बंद हो गया। मैं परिवार के साथ किराए के कमरे में रहता हूं। मेरे पैसे खत्म हो चुके हैं और राशन भी खत्म ही होने वाला है। हमारे लिए आने वाला समय काफी मुश्किल होने वाला है।' दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मकान मालिकों से अनुरोध किया था कि वे तीन महीने तक किराया न लें। हालांकि बिजवासन में मुख्यमंत्री की अपील बेअसर नजर आती है। यहां मकान मालिक किराएदारों पर जल्दी किराया देने का दबाव डाल रहे हैं।

एक अन्य अप्रवासी मजदूर राकेश (28) का कहना है, 'मकान मालिक हमसे लगातार किराया मांग रहे हैं। अब हमारे पास पैसे ही नहीं बचे हैं। सरकार से भी राशन नहीं मिल रहा है। इस अनिश्चितता के दौर में दुकानदार भी उधार देने से मना कर रहे हैं। हमें कोई राह नहीं सूझ रही है।'

केजरीवाल सरकार ने राशन कार्ड न होने पर ई कूपन की व्यवस्था की थी। इसके तहत राशन कार्ड ना होने पर तीन महीने तक फ्री राशन देने का ऐलान किया गया था। टेक्नोलॉजी की कम समझ रखने वाले अप्रवासी मजदूरों के लिए आवेदन करना टेढ़ी खीर था। हालांकि कुछ मजदूरों ने आवेदन भी किया तो उन्हें ई कूपन नहीं मिला। लॉकडाउन के चलते फंसे इंद्रजीत बताते हैं, 'मैंने पिछले महीने ही आवेदन कर दिया था लेकिन मुझे अभी तक ई-कूपन नहीं मिला है। अब हमारे सामने राशन की समस्या आ गई है। सरकार न तो हमें राशन दे रही है और न ही हमें घर जाने दे रही है।'

बीते विधानसभा चुनाव में बिजवासन विधानसभा सीट से AAP के भगवंत सिंह जून को जीत मिली थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने न तो चुनाव प्रचार के दौरा क्षेत्र का दौरा किया था और न अब आ रहे हैं। बिजवासन बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है। इस संकट की घड़ी में स्थानीय जनता अपने विधायक की तरह सांसद की बाट जोह रही है। सरकार ने लोगों की जान बचाने के लिए अर्थव्यवस्था को दांव पर लगाकर लंबा लॉकडाउन लगाया है। लेकिन अगर जरूरतमंद लोगों की भूख की समस्या का समाधान नहीं हुआ तो शायद लॉकडाउन अपने मकसद में नाकाम हो जाएगा।

सरकार ने कुछ औद्योगिक इकाइयों को कामकाज शुरू करने के लिए थोड़ी-बहुत ढील दी है लेकिन उद्योग जगत पटरी को पटरी पर आने में वक्त लगेगा। सरकार को तब तक के लिए गरीब और कमजोर तबके के लोगों के खाने-पीने का इंतजाम करना चाहिए ताकि कोरोना वायरस से बचने वाले भुखमरी से भी बच जाएं।