बीती 16 अगस्त को देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निधन हो गया.कल दिल्ली में उनके लिए एक शोकसभा थी.इस शोकसभा में पीएम नरेंद्र मोदी,पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और गुलाम नबी आजाद समेत कई नेताओं ने अटल बिहारी वाजपेयी को याद किया.

पूर्व उपप्रधानमंत्री और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ बीजेपी को खड़ा करने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने इस मौके पर बड़े ही भावुक अंदाज में अटल जी के साथ अपने सफर को कुछ इस तरह से बयां किया-

"जीवन में बड़ी सभाएं संबोधित की लेकिन आज जैसी यह सभा मैं कभी संबोधित करूंगा ये कल्पना नहीं की थी.मैं जब आज जैसी सभा कह रहा हूं तो मुझे इसका पहला लक्षण तो यही याद आता है कि कोई ऐसी सभा जिसमें अटल जी उपस्थित न हों.मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था कि मुझे कभी ऐसी सभा संबोधित करनी पड़ेगी जिसमें अटल जी न हों.प्रकृति से जैसे अटल जी रहे हैं वे कहते थे कभी कभी मैं कितनी दिन रहूंगा.इस तरह की बात जब वो करते थे तब मन में तकलीफ होती थी.मैंने जब पुस्तक लिखी थी अपने जीवन की आत्मकथा की ,उसमें अटल जी का उल्लेख था लेकिन जब वो विमोचन पर नहीं आए तो मुझे बहुत कष्ट हुआ.और मैं इसका उल्लेख हर जगह करता था,की मैंने पुस्तक लिखी,पुस्तक का प्रकाशन भी हुआ लेकिन जब विमोचन हुआ तब वो उपस्थित नहीं,मुझे इस बात का बेहद कष्ट हुआ.आज स्वयं अटल जी उपस्थित नहीं हैं और ऐसी एक असाधारण सभा हो रही है जिसमें अटल जी को जानने वाले,अटल जी के साथ काम रने वाले अनेक कार्यकर्ता नहीं हैं बल्कि अनेक पार्टियों के नेता जिनका जनसंघ,संघ से संबंध नहीं है वो भी यहां उपस्थित हैं.इस बात की मुझे बेहद खुशी है.

प्रधानमंत्री जी जैसा वर्णन कर रहे थे और अटल जी के गुण सामने रख रहे थे.और भी लोग ऐसा कर सकते थे लेकिन मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मेरी मित्रता अटल जी से 65 साल तक रही है.मैंने उनको निकट से देखा है.और जैसा प्रधानमंत्री जी ने कहा कि साथ साथ कई अनुभव किए.हम सिनेमा भी साथ साथ देखते थे,पुस्तकें भी साथ साथ पढ़ते थे.इतना ही नहीं तो कोई अगर अटल जी के परिचय का अगर साक्षात्कार उनके जीवन से करेगा तो जानेगा की अटल जी की विशेषता थी की भोजन बहुत अच्छा बनाते थे.उनके साथ रहकर मुझे अनुभव हुआ की अगर भोजन पकाने वाला कोई नहीं होता था तो वो खुद बनाकर खिलाते थे भले ही वो खिचड़ी ही क्यों न हो.मैं इस बात का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं की अगर एक दिन मैंने अपनी पुस्तक लिखकर प्रकाशित की और सार्वजनिक रूप से मैं उसे वितरित करूंगा ये तय किया और अटल जी उस पुस्तक के विमोचन में नहीं आए तो मुझे बहुत कष्ट हुआ.और आज जब मैं बोल रहा हूं तो अटल जी की अनुपस्थिति में बोल रहा हूं.इस बात का बहुत कष्ट होता है.

मैं उनसे बहुत सीखा हूं.उनसे बहुत पाया है मैंने.यूं तो यह पार्टी ऐसी जिसमें बहुत से लोग मुझे सिखाने आए और अटल जी उनमें प्रमुख हैं लेकिन मैं भूल नहीं पाता हूं की वो कितने महान लोग हैं और आज यहां कितने महान लोग बैठे हैं जिनका साथ जिस जिस को मिलता है वो बहुत कुछ सीख पाता है.संघ के संघ चालक से हमने बहुत कुछ सीखा और आज जब वो अटल जी के बारे में बता रहे थे तो मैं उनके एक एक शब्द को ग्रहण करने की कोशिश कर रहा था और सोच रहा था की कितना अच्छा होता की अटल जी की अनुपस्थिति में बातें न कहते बल्कि उनकी उपस्थिति में कहते.कितना अच्छा होता,कितना संतोष होता और कितना समाधान होता.

बहुत कुछ हमने सीखा अटल जी से,बहुत कुछ पाया अटल जी से इसलिए दुख होता है कि वो हमको छोड़कर के और हम से अलग हो गए.नियम है लेकिन इतना ही कह सकता हूं अटल जी ने जो कुछ हमको सिखाया,जो कुछ हमको दिया.उसको ग्रहण करके हम अपना जीवन बिताएं.जितना हम ये कर सकेंगे तो जो संस्कार हमने RSS से पाए हैं हमने उन संस्कारों को कार्यांवित किया ये हमको मन में संतोष होगा.यही कहकर मैं विनम्र श्रद्धांजलि अटल जी को समर्पित करता हूं.और ये भगवान से प्रार्थना करता हूं कि उनके बताए हुए मार्ग पर मैं जीवन भर चल पाऊं और सभी साथियों को इसके लिए प्रेरित कर सकूं ये शक्ति भगवान मुझे दे."