पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव जैसे जैसे नजदीक आ रहे है वैसे ही राजनैतिक जोड़ तोड़, जुगाड़ और तिकड़मबाजी तेज हो रही है। लगभग पिछले २ सालों से महागठबंधन का ढिढोंरा पीट कर विपक्षी एकता दिखाती पार्टिया अभी तक एक मंच पर आना तो दूर रहा सीटों के बटवारें में उलझी हुई है। मायावती के मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अकेले चुनाव में उतरने की घोषणा के बाद महागठबंधन दूर की कौड़ी ही नजर आता है।

कांग्रेस के नेता मायावती को बीजेपी के लिए काम करने का आरोप लगा रहे है वंही मायावती ने कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह को आरएसएस का एजेंट करार दे दिया।

अब सवाल यह उठता है की मायावती विपक्षी एकता को तोड़ने और अकेले चुनाव में जाना क्यों चाहती है।

कांग्रेस या अन्य पार्टियों के नेता भले ही मायावती पर तरह तरह के आरोप लगा रहे हो पर सच्चाई यह है की मायावती राजनीति की एक कुशल खिलाड़ी है, भले ही वह पिछले कुछ समय से सत्ता से बाहर है पर उनकी राजनैतिक समझ उत्तर प्रदेश के तमाम बड़े युवा नेताओ से ज्यादा है। दो विधान सभा चुनाव और पिछले लोक सभा चुनाव में मायावती अपने गढ़ उत्तर प्रदेश में कुछ खास करने में असफल रही। वो ये जानती है की कम से कम अगले विधानसभा चुनाव तक वो राज्य की राजनीति में कुछ खास नहीं कर सकती। अभी तक दलित वोटों में जाटव वोटों पर मायावती का एकाधिकार रहा है पर पिछले कुछ समय में भीम आर्मी जैसे संगठन उभर कर आ रहे है। भले ही इस तरह के संगठन पुराने वफादार वोटरों को अपनी तरफ आकर्षित न करते हो पर जाटव समाज के युवा वोटर को अपनी तरफ खींचने की क्षमता इनमे है। हालांकि भीम आर्मी ने अभी तक चुनावी राजनीति में आने की कोई घोषणा नहीं की है फिर भी मायावती जाटव वोटर में किसी तरह की सेंधमारी पसंद नहीं करेंगी।

मायावती जानती है की लम्बे समय से सत्ता से दूरी पार्टी को कमजोर करेगा और जिस तरह से बीजेपी दलित वोटरों को लुभाने के लिए तरह तरह के प्रयत्न कर रही है वो कुछ प्रतिशत वोट का नुकसान भी कर सकती है।

मायावती ये अच्छी तरह से जानती है की कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में कोई वोट बैंक नहीं है। वो नहीं चाहेंगी की गठबंधन करने पर उनका कोर वोटर दूसरी पार्टियों को आसानी से ट्रांसफर हो जाये और उसके बदले में उन्हें कुछ न मिले। इसलिए आने वाले लोकसभा चुनाव में सपा, बसपा के गठबंधन होने पर भी मायावती कांग्रेस के लिए शायद ही तैयार हो।

मौजूदा परिस्तिथियों में मायावती का मुख्य एजेंडा लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में ज्यादा से ज्यादा सीट जीतने और दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनाव में कम से कम अपनी मजबूत उपस्तिथि जताना है। मायावती जानती है की वर्तमान समय में कांग्रेस केंद्र की सत्ता में वापसी कर पाने में सफल हो ऐसा असंभव ही मालूम पड़ता है। ऐसे में अगर वो उत्तर प्रदेश में अच्छी संख्या में सीट निकाल पाने में सफल हो जाती है और केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनती है तो मायावती एनडीए में शामिल हो कर कोई महत्त्पूर्ण पद केंद्र सरकार में हासिल कर सकती है। जो बसपा के लम्बे समय से सत्ता की दूरी को भी ख़त्म कर देगा साथ ही पार्टी और अपने कोर जाटव वोटर पर उनकी पकड़ बनाये रखेगा।