लोकसभा चुनाव का काउंटडाउन शुरू हो चुका है.रोज प्रत्याशियों का एलान हो रहा है तमाम नेता अपनी पुरानी पार्टी छोड़कर नई पार्टी में जा रहे हैं.यूपी में लोकसभा की 80 सीटें हैं.इसलिए माना जाता है की दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है.इन 80 सीटों में से प्रदेश में 17 सीटें अनूसूचित जाति के लिए सुरक्षित हैं.आज हम आपको बताने जा रहे हैं यूपी की ऐसी ही एक सुरक्षित हरदोई के समीकरण के बारे में.पिछली बार यहां सत्ताधारी बीजेपी ने जीत दर्ज की थी क्या इस बार भी बीजेपी ये जादू दोहरा पाएगी ?

हरदोई आजादी के बाद से ही अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीट है.1957 में हरदोई लोकसभा सीट बनी. कांग्रेस 6 बार यहां से चुनाव जीतने में सफल रही, जबकि 3-3 बार बीजेपी और सपा इस सीट पर जीत दर्ज कर चुकी हैं.हरदोई लोकसभा सीट पर 2011 के जनगणना के मुताबिक कुल जनसंख्या 25,84,173 है. इसमें 85.55 फीसदी ग्रामीण औैर 14.45 शहरी आबादी है. लोकसभा सीट पर 2017 के मुताबिक 17,69,870 मतदाता और 1,857 मतदान केंद्र हैं. अनुसूचित जाति की आबादी इस सीट पर 30.79 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की आबादी 0.01 फीसदी है. इसके अलावा मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 13 फीसदी के करीब है.इनके अलावा कुर्मी, ब्राह्मण मततादाओं के अलावा पिछड़े वर्ग की बड़ी आबादी इस क्षेत्र का परिणाम तय करने में अहम है.इस बड़ी लोकसभा सीट में पांच विधानसभाएं शामिल हैं.हरदोई,सवायजपुर,सांडी,गोपामऊ और शाहाबाद ये पांच विधानसभाएं हैं.

अगर नेता की बात करें तो हरदोई एक पहचान नरेश अग्रवाल से की जाती है.कहते हैं की हरदोई की पूरी सियासत हरदोई के इसी 'नरेश' के इर्द गिर्द घूमती है लेकिन पिछले चुनाव की मोदी लहर ने नरेश के किले को भेद दिया.नरेश उस वक्त सपा के राज्यसभा सदस्य थे.बेटा हरदोई सदर सीट से विधायक था.चुनाव में तीन बार पूर्व में भी सांसद रह चुकीं ऊषा वर्मा सपा प्रत्याशी थीं.ऊषा वर्मा के बारे में खास बात ये है की वो नरेश की भी करीबी हैं.बीते चुनाव में चाय़वाला कहकर पीएम मोदी का मजाक उड़ाने वाले नरेश ऊषा वर्मा को जिता नहीं पाए थे.यहीं नहीं ऊषा वर्मा को चुनाव में तीसरे नंबर पर रहना पड़ा था.बीजेपी के युवा नेता अंशुल वर्मा ने यहां बीएसपी के शिवप्रसाद वर्मा को 83 हजार 343 वोटों से हराकर चुनाव जीता था.2014 के चुनाव में यहां करीब 56 फीसदी मतदान हुआ था.अंशुल वर्मा को यहां 3,60,501 वोट मिले थे.बसपा के शिवप्रसाद वर्मा को यहां 2,79,158 वोट मिले थे.उस वक्त की सांसद उषा वर्मा को 2,76,543 वोट मिले थे.कांग्रेस प्रत्याशी शिवकुमार को यहां सिर्फ 23,298 वोट मिले थे.

इस चुनाव में हालात बदल गए हैं.बीएसपी-एसपी का गठबंधन हो चुका है.ऊषा वर्मा उनकी उम्मीदवार हैं.स्थानीय लोगों के बीच उनकी छवि कभी खराब नहीं रही है.दूसरी तरफ बीजेपी सांसद अंशुल वर्मा का टिकट गया है.उनकी जगह जयप्रकाश रावत उम्मीदवार हैं.रावत हरदोई सीट पर तीन बार सांसद रह चुके हैं.नरेश अग्रवाल के वो पुराने मित्र हैं.बीते चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन खासा कमजोर रहा था.इस बार उन्हें भी अपेक्षाकृत बेहतर प्रत्याशी मिला है.कांग्रेस से इस बार वीरेंद्र वर्मा मैदान में हैं.वीरेंद्र वर्मा जिले की दो विधानसभा सीटों से विधायक रह चुके हैं.2007 में वो अहिरोरी विधानसभा सीट से विधायक थे.2012 में नए परिसीमन में ये सीट खत्म हो गई.ऐसे में वीरेंद्र वर्मा को बीएसपी ने सांडी विधानसभा सीट से उतारा और उन्होंने जीत भी दर्ज की.2017 विधानसभा चुनाव के बाद उन्होंने बीएसपी छोड़ और साइकिल की सवारी की.वो ऊषा वर्मा के साथ ही एसपी से टिकट के उम्मीदवार थे लेकिन आखिर में ऊषा वर्मा उन पर भारी पड़ीं.ऐसे में वीरेंद्र वर्मा अब कांग्रेस से मैदान में हैं.शिवपाल सिंह यादव की पार्टी से भी फूलचंद्र वर्मा मैदान में हैं.उनके साथ समाजवादी पार्टी के कई स्थानीय यादव जाति के नेता मजबूती से खड़े हैं.

इस नई तस्वीर के आधार पर बात करें तो अनूसूचित जाति का वोट तीन बड़े प्रत्य़ाशियों में बंटता दिखाई पड़ता है.एसपी बीएसपी गठबंधन का उम्मीदवार होने से ऊषा वर्मा को दोनों पार्टियों के परंपरागत वोट का मिलना तय है.13 फीसदी मुस्लिम आबादी का वोट भी उनकी राह आसान कर सकता है.दूसरी तरफ जयप्रकाश रावत को बीजेपी के कोर वोटर का साथ मिलना तय है.इसके साथ ही वो ओबीसी में गैर यादव वोट बैंक वाली जातियों को अपने पाले में लाने का प्रयास करेंगे.खुद पासी समाज से आने वाले रावत गैर जाटव दलित वोट में भी बड़ा हिस्सा लेंगे.उधर कांग्रेस के वीरेंद्र वर्मा भी उसी गैर जाटव दलित वोट बैंक में सेंध लगाएंगे,लेकिन उन्हें मुस्लिम समेत अन्य वर्गों का साथ मिलना मुश्किल है.शिवपाल यादव की पार्टी के उम्मीदवार फूलचंद्र वर्मा भी एक छोटे विधानसभा के एक हिस्से का वोट ले सकते हैं लेकिन यादव वोट बैंक में उनका सेंध लगा पाना मुश्किल होगा.ऐसे में मुख्य़ मुकाबला बीजेपी और सपा के बीच होता दिख रहा है.इस कड़े चुनाव में मतदान प्रतिशत की भूमिका भी अहम होगी.जो पार्टी अपने कोर वोटर निकालने में कामयाब रही वो हरदोई की ये लड़ाई जीतने में कामयाब रहेगी.