कल सोशल मीडिया पर भारत-चीन तनाव की दो तस्वीरें खूब चर्चा में रहीं. ये दो तस्वीरें दोनों देशों के जवानों के बीच टकराव की थीं. एक तस्वीर में बुरी तरह घायल भारतीय सैनिक नजर आ रहे हैं, वहीं दूसरी तस्वीर में भारतीय जवान चीनी सैनिकों को मार भगाते नजर आ रहे हैं. एक चीनी सैनिक को भारतीय सैनिक पकड़े हुए भी नजर आ रहे हैं.

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भारतीय सेना ने घायल भारतीय सैनिकों वाली तस्वीरों की पुष्टि नहीं की है. अगर तस्वीरों के बारे में बात करें, तो हमें हाल फिलहाल भारत-चीन के बीच तनाव के बारे में बात करनी होगी. भारत और चीनी सैनिकों के बीच हाथापाई की खबरें आईं थीं. खबरों के मुताबिक हाथापाई में दोनों पक्ष के सैनिक घायल हुए थे. इस खबर के बारे में सभी को जानकारी थी. जब तस्वीरें आईं, तो सोशल मीडिया पर लोग रिएक्ट करने लगे. भारत के एक कथित उदारवादी और बुद्धिजीवी वर्ग का खून खौल उठा. भारतीय सैनिकों की तस्वीरें देखकर, ये उदारवादी लोग तुरंत ही मोदी सरकार से कार्रवाई की मांग करने लगे. मोदी सरकार को लानतें भेजी जानें लगी कि सरकार सैनिकों को राजनीति में इस्तेमाल करके भूल गई. ऐसे तमाम उदारवादियों के ट्वीट दिखे, जिसमें वो चीन पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं. दरअसल, ये वो मौका था, जब एक बार से देश के इस कथित बुद्धिजीवी वर्ग को अपनी कुंठा दिखाने का मौका मिला.

आप इनकी कुंठा को प्रदर्शित करने का तरीका देखिए, वो एक ही तस्वीर के बारे में बात कर रहे हैं. वो तस्वीर जिसमें सिर्फ घायल भारतीय सैनिक हैं. दूसरी तस्वीर के बारे में ये लोग शांत हैं. अगर वो तस्वीर लगाएंगे, तो साफ हो जाएगा कि टकराव हुआ है. ऐसे में मोदी सरकार पर भला निशाना कैसे साधेंगे और एजेंडा पूरा कैसे होगा. इसलिए, सिर्फ एक तस्वीर को अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर चिपकाकर, भारत का ये महान बुद्धिजीवी और उदारवादी वर्ग मोदी सरकार के खिलाफ अपनी घृणा का भद्दा प्रदर्शन करता नजर आया. जब सेनाओं के बीच टकराव की खबर थी, तो निश्चित तौर पर दोनों देशों के सैनिक घायल भी होंगे, इसमें उत्तेजित होकर सरकार को भला-बुरा कहने की क्या आवश्यकता है.

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भारत की 1962 में चीन से लड़ाई हुई थी. उस वक्त भी भारत के अंदर से चीन के समर्थन में आवाज उठी थी. आज उससे भी हालात बदतर हैं. सैनिकों की तस्वीरों के नाम पर राजनीति देखकर ये बात साफ समझ में आती है कि देश के अंदर हालात 1962 से भी बुरे हैं. भारत चीन से तो लड़ सकता है लेकिन देश के अंदर बैठे, इन कथित बुद्धिजीवियों से लड़ना बहुत मुश्किल है.