असम पुलिस में सब इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत और सेना से ऑनररी कैप्टन के पद से रिटायर हुए मोहम्मद सनाउल्लाह को असम पुलिस ने गिरफ्तार करके डिटेंशन सेंटर भेज दिया है। असम पुलिस ने ऐसा इसलिए किया है क्यों की मोहम्मद सनाउल्लाह कोर्ट में ये साबित करने में असफल रहे की 25 मार्च 1971 से पहले वो भारत में कानूनी रूप से मौजूद थे। वो ऐसा कोई सबूत भी कोर्ट को देने में असफल रहे जिससे ये साबित होता हो की वो जन्म से भारतीय है

नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजनशिप में नाम न होने बाद फॉरनर्स ट्राइब्यूनल ने उन्हें विदेशी करार दे दिया। जिस समय उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा था उन्होंने पत्रकारों से कहा की ये बहुत ही अजीब स्तिथि है की जिस देश के लिए उन्होंने 30 साल सेना में दिए, कारगिल में लड़ाई लड़ी वंही उन्हें ये कह कर गिरफ्तार किया जा रहा है की वो हिंदुस्तानी नहीं है।

हालांकि इस केस के दो नजरिये से देखा जा सकता है। पहला मोहम्मद सनाउल्लाह वाकई न तो जन्म से हिंदुस्तानी है न ही कानूनी रूप से भारत आये। अगर ऐसा ही है तो एक व्यक्ति बाहर से आ कर आपकी सेना में भर्ती हो जाये और 30 साल तक काम करता रहे, कारगिल जैसे युद्ध में लड़े और आपको पता ही नहीं चलता की ये व्यक्ति भारतीय नहीं है। इसे सिस्टम का नाकारापन ही कहेंगे। अगर किसी व्यक्ति का मकसद सेना में शामिल होकर जासूसी करना हो तो इस लचर सिस्टम में वो अपना काम आसानी से कर सकता है।

दूसरा पहलु ये भी है की असम की बात छोड़ दे तो पूरे देश में भी बहुत से ऐसे लोग होंगे जिनसे अगर 1971 से पहले भारतीय होने का लिखित सबूत मांग दिया जाये तो शायद ही दे पाए। ऐसे में एक व्यक्ति जिसने देश की सेवा की, कारगिल युद्ध में उसके योगदान को सराहते हुए सेना ने उसे पदोन्नति दी, ऐसे केस को सामान्य केस से अलग हट कर देखा जाये।