हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को राष्ट्रपति ने राज्यसभा के लिए मनोनीत कर दिया. रंजन गोगोई ने अयोध्या विवाद, राफेल समेत कई विवादों में फैसला सुनाया था. उन्हें रिटायर हुए अभी मात्र 4 महीने हुए हैं. रंजन गोगोई के राज्यसभा जाने पर सवाल उठ रहे हैं. रंजन गोगोई के राज्यसभा जाने पर सवाल उठ रहे हैं. इस पूरे घटनाक्रम को सीधे तौर पर सरकार और न्यायपालिका के बीच एक अनैतिक संबंध के तौर पर देखा जा रहा है. सवाल उठना लाजिमी भी है हालांकि रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट के अकेले जज नहीं हैं जो राज्यसभा जा रहे हैं, उनसे पहले भी सुप्रीम कोर्ट के दो जज राज्यसभा पहुंच चुके हैं. भारत में न्यायपालिका पर ये सवाल पहली बार नहीं उठ रहे हैं इससे पहले न्यायपालिका सवालों के कठघरे में आ चुकी है. ऐसे ही कुछ किस्सों का जिक्र हम आज करने वाले हैं.

बहरुल इस्लाम सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते थे. 1956 में वो कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए. 1962 में वो कांग्रेस से राज्यसभा भेजे गए. 1967 में वो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े और हारे लेकिन 1968 में वो फिर से राज्यसभा भेजे गए. 1972 में इंदिरा गांधी ने उन्हें गुवाहाटी हाईकोर्ट का जज बनाया. इसके बाद इस्लाम ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया.1979 में बहरुल इस्लाम जज के पद से रिटायर हुए. 1980 में वो सक्रिय राजनीति में चले गए. दिसंबर 1980 में उन्हें फिर से सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया. 1980 से 1983 तक वो सुप्रीम कोर्ट के जज बने रहे. इस दौरान उन्होंने बिहार के सीएम जगन्नाथ मिश्रा को अर्बन कॉपरेटिव बैंक घोटाले से बरी किया. इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस्तीफा दे दिया और असम के बारपेटा से लोकसभा चुनाव लड़ने पहुंचे. इंडिया टुडे के मुताबिक उन्होंने कहा, मुझे असम के लिए कुछ करना है." हालांकि असम की हालत खराब रही और वो चुनाव चल गए. इसके बाद कांग्रेस ने उन्हें तीसरी बार लोकसभा भेजा.

जस्टिस रंगनाथ मिश्रा का नाम भी इसी कड़ी सामने आता है. पीएम राजीव गांधी ने दंगों की जांच के लिए रंगनाथ मिश्रा आयोग बनाया. रंगनाथ मिश्रा इस आयोग के इकलौते सदस्य थे. आयोग की सहायता के लिए एक सिटिजन जस्टिस कमेटी बनाई गई जिसमें कई कानूनविद और वकील शामिल थे. आयोग की आलोचना के बाद इस कमेटी को हटा दिया गया.

जांच के बाद आयोग ने कांग्रेसी नेताओं को दंगे में क्लीन चिट दे दी. इन नेताओं में सज्जन कुमार से लेकर आजकल एमपी के सीएम कमलनाथ तक शामिल थे. आयोग की रिपोर्ट के बाद सिटिजन जस्टिस कमेटी के सदस्यों जस्टिस तारकुंडे और सोली सोराबजी ने फैसले की आलोचना की. तारकुंडे ने कहा, "ये पूरी तरह एकतरफा जांच थी. हमें जिस तरह वादा किया गया था वैसे कभी भी जांच में शामिल नहीं होने दिया गया. सोली सोराबजी ने इंडिया टुडे को बताया,"अहम इंटरव्चू बंद कमरों में हुए, हमें किसी से भी क्रॉस क्वेश्चन का मौका नहीं दिया गया".

1975 में इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया. इस दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गएऔर उस वक्त ये याचिका आई थी कि क्या आपातकाल में कोई नागरिक अपने अधिकार को लेकर सरकार के खिलाफ कोर्ट जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने इस मामले में सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया था. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब था कि सरकार आपातकाल में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन कर सकती है. इस केस में सरकार के खिलाफ फैसला देने वाले जज एचआर खन्ना को परिणाम भुगतना पड़ा था. सीनियर होने के बावजूद उनकी अनदेखी की गई और एमएच बेग को चीफ जस्टिस बनाया गया.