बीते दिनों एक खबर मीडिया में बार बार आ रही है कि सरकार आर्थिक आरक्षण को भी आरक्षण का हिस्सा बनाने जा रही है.खबरों के मुताबिक अभी के जाति आधारित आरक्षण को बिना प्रभावित किए आर्थिक रुप से कमजोर लोगों को भी आरक्षण देने पर विचार किया जा रहा है.इसके तहत भारत में आरक्षण का दायरा बढ़कर 50 फीसदी से बढ़ जाएगा.चूंकि सरकार 15 से 18 फीसदी आरक्षण देने पर विचार कर रही है इसलिए ये भारत में सरकारी नौकरियों में आरक्षण का दायरा 68 फीसदी हो सकता है.खबरों के मुताबिक संसद के शीतकालीन सत्र में संविधान संशोधन बिल लाएगी जिससे आरक्षण की सीमा को बढ़ाया जा सके.सवाल ये है कि सरकार इस कदम से क्या करना चाहती है और अगर ऐसा कोई बिल आता है तो उसका क्या फर्क पड़ेगा.

सरकार के इस कदम को हम 2 पैमानों पर माप सकते हैं एक क्या वाकई सरकार आरक्षण में कोई सुधार करना चाहती है और दूसरा राजनीती के पैमाने पर.अगर बात पहले पैमाने पर करें तो सरकार का ये कदम ऐसा लगता है कि आरक्षण में सुधार नहीं बल्कि बड़ी विसगंति पैदा करने वाला है.सरकार एक और श्रेणी आरक्षण में जोड़ने वाली है.इसका मतलब है कि है कि 50फीसदी के बजाय अब लगभग 70 फीसदी आरक्षण हो जाएगा.ऐसे में जो तबका आरक्षण से परेशान था वो और परेशान हो जाएगा क्योंकि आर्थिक आरक्षण में जातिगत बाध्यता नहीं होगी.ऐसे में उस 17-18 फीसदी आरक्षित सीटों में प्रतियोगिता ज्यादा होगी और सवर्ण समाज की मुश्किलें के साथ साथ समाज में वैमनस्य और ज्यादा बढ़ेगा.

दूसरी तरफ आरक्षित वर्ग के लिए बेशक मौके तो ज्यादा होंगे लेकिन उस 18 फीसदी में इतनी जातियां होंगी की उनके लिए भी बेहद सीमित मौके होंगे ऐसे में इसका कोई खास फायदा उन्हें भी नहीं मिलने वाला तो क्यों न आरक्षण की पुरानी व्यवस्था को ही लागू रखा जाए.अगर किसी तरह का खास फायदा न हो तो इस तरह के नियम के क्या मायने हैं.योगेंद्र यादव और धोखे में ही सही संघ प्रमुख मोहन भागवत आरक्षण की समीक्षा की बात कर चुके हैं अगर वाकई सरकार कुछ करना चाहती है तो उसे पूरी ईमानदारी से आरक्षण की समीक्षा करनी चाहिए ताकि आरक्षण का वास्तविक उद्देश्य जो कमजोरों को मजबूती देना है वो सफल हो और वास्तविक रूप से कमजोरों को लाभ मिल सके.

अब दूसरे और अहम राजनीतिक पैमाने पर आते हैं.2019 का चुनाव नजदीक है.सरकार SC-ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने का पूरा मन बना चुकी है.संसद में बिल लाकर इसे संशोधित भी किया जाएगा.प्रमोशन में आरक्षण पर सुनवाई के दौरान भी सरकार SC-ST के पक्ष में बोल चुकी है.ऐसे में सरकार ये जानती की आगामी चुनाव में उनका पारंपरिक सवर्ण वोटर उनसे छिटक सकता है ऐसे में सरकार कोशिश कर रही है कि किसी तरह इस वोट बैंक को बचाया जाए.अगर सरकार आर्थिक आरक्षण जैसा कोई कदम उठाती है तो उसे उम्मीद होगी की कम से कम उसका सवर्ण वोटर साथ बना रहे.सरकार इस तरह के डैमेज कंट्रोल करना चाहती है ताकि वो उसका वोट बैंक बना रहे और हो सकता है कि सरकार ये करने में कामयाब भी हो जाए लेकिन निश्चित तौर पर सरकार को अपनी इस नीति का ठीक से प्रचार भी करना होगा वर्ना शायद ऐसा भ्रम फैले की SC-ST एक्ट और प्रमोशन में आरक्षण पर सरकार को अपने सकारात्मक रवैये के बावजूद दलितों के वोट से हाथ धोना पड़ सकता है.