दिल्ली में आम आदमी पार्टी चुनाव जीत गई है. चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई है. कांग्रेस के बारे में तो कोई चर्चा के लिए भी तैयार भी नहीं है. चुनाव के बाद कई तरह के विश्लेषण सामने आ रहे हैं. कई लोगों का मानना है कि इस चुनाव में नफरत की हार हुई है. उनका ये बयान बीजेपी के संदर्भ में है. बीजेपी के कई नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान विवादित बयान दिए, उन पर कार्रवाई भी हुई. उधर केजरीवाल समेत आम आदमी पार्टी ने अपना चुनाव प्रचार अपने काम के आधार पर किया. अपना 5 साल का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखा. चुनाव में उन्हें मुसलमानों का बड़ा समर्थन भी हासिल हुआ. ऐसे में तमाम लोग इसे सेकुलर भारत की जीत बता रहे हैं. क्या वाकई केजरीवाल की जीत सेकुलर भारत की जीत जैसी है. क्या वाकई केजरीवाल भारत की कथित सेकुलर राजनीति के चेहरे बनने वाले हैं. इन्हीं सवालों के जवाब आज ढूंढने की कोशिश करेंगे.

अरविंद केजरीवाल सेकुलर राजनीति के बारे में जानना है तो उनके पूरे चुनाव प्रचार की ओर देखना होगा. CAA के खिलाफ हिंसक आंदोलनों और शाहीन बाग के प्रोटेस्ट के बीच केजरीवाल का चुनाव प्रचार शुरु हुआ. CAA के खिलाफ केजरीवाल की पार्टी ने संसद में वोट किया. अरविंद केजरीवाल ने टीवी इंटरव्यू में कई जगह CAA की खामियां बताईं लेकिन रैलियों में उन्होंने इसका जिक्र नहीं किया. पूरी आम आदमी पार्टी से कोई भी बयान CAA के खिलाफ नहीं आया. केजरीवाल जानते थे कि CAA के खिलाफ बयान उन्हें बहुसंख्यक हिंदू वोटरों से दूर कर सकता है. जामिया में हिंसा हुई तो केजरीवाल ने पीसफुल प्रोटेस्ट करने की अपील की. शाहीन बाग का आंदोलन हुआ. महिलाएं सड़क जाम करके बैठ गईं. अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी का कोई भी बड़ा नेता इस प्रोटेस्ट में नहीं गया. मनीष सिसोदिया ने जरूर एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि हम शाहीन बाग के साथ हैं. हालांकि अरविंद केजरीवाल ने एक दूसरे टीवी इंटरव्यू में इस बात को घुमा भी दिया. बीजेपी ने अपने पूरे चुनाव प्रचार में शाहीन बाग का खूब इस्तेमाल किया लेकिन केजरीवाल टस से मस नहीं हुए. आमतौर पर माना जाता है कि मुसलमान उस पार्टी को वोट करते हैं जो बीजेपी के खिलाफ मजबूत होती है. केजरीवाल जानते थे कि यहां मुकाबला बीजेपी से है और मुस्लिम वोट उन्हें मिलना तय हैं. ऐसे में ज्यादा कोशिशों से हिंदू वोटरों पर असर भी पड़ सकता है. ऐसे में उन्होंने कोई ऐसा खास कदम नहीं उठाया बल्कि उन्होंने एक चैनल पर हनुमान चालीसा पढ़ी और हनुमान मंदिर भी गए. राजनीति की आम भाषा में इसे सॉफ्ट हिंदुत्व कहा जाता है.

अरविंद केजरीवाल की राजनीति देखकर राजीव गांधी की याद आती है. वो राजीव गांधी जिनके वक्त में अयोध्या के विवादित ढांचे में मूर्तियां रखवाई गईं लेकिन उन्होंने ही मुस्लिमों को खुश करने के लिए शाहबानों के तीन तलाक केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया. उन्हीं राजीव गांधी के पीएम रहते दिल्ली में सिखों का नरसंहार हुआ. वाकई तमाम लोग राजीव गांधी को सेकुलर कहते होंगे क्योंकि वो कांग्रेस पार्टी के नेता थे जिनकी पत्नी और बेटे ने आज की सेकुलर राजनीति का झंडा उठाया हुआ है. लेकिन ये बात सभी जानते हैं कि राजीव गांधी सत्ता की चाह रखने वाले एक आम नेता ही थे जो वक्त के साथ रंग बदल सकता था. अरविंद केजरीवाल की सियासत भी ऐसी ही नजर आती है. इसमें कुछ भी कम्यूनल या सेकुलर नहीं है. ये बस सीधी सपाट राजनीति है.

दिल्ली चुनाव के नतीजे को सेकुलर, कम्यूनल के नजरिए से देखने वाले साफ देख सकते हैं कि केजरीवाल की जीत में योगदान उनके पांच साल के काम का है. उनके चेहरे का है, जिसके सामने बीजेपी कोई चेहरा ढूंढ नहीं पाई. इस चुनाव का नतीजा सेकुलर राजनीति का झंडा उठाने वालों के लिए एक खतरनाक संदेश भी है क्योंकि जनता ने उस व्यक्ति को चुना है जिसने सेकुलरिज्म के चोले को दूर रख दिया. केजरीवाल के पास तो छोटा राज्य था, जातिगत कोई खास समीकरण नहीं थे लेकिन जिनके सामने ये चुनौतियों भी होंगी, उनकी चिंता दिल्ली चुनाव के नतीजे ने बढ़ा ही दी होगी. ऐसे में अरविंद केजरीवाल के सेकुलर राजनीति का चेहरा बनने की बात महज एक कोरी कल्पना नजर आती है.