वक्त के साथ, कोरोना का संकट भी देश में गहराता जा रहा है और संकट के साथ सरकारें भी गहरी नींद में जाती हुई नजर आ रही हैं. एक वो वक्त था, जब देश में पीएम समेत बड़े बड़े नेता कोरोना से लड़कर इसे हराने की बात करते थे. आज के दौर में सभी गायब नजर आ रहे हैं. न तो कोई ताली-थाली बजाने का टास्क दे रहा है और न ही दीप जलाने का. ऐसा लगता है कि संकट की गहराई का पता, हमारे देश के नेताओं को अब चला है. अभी की बात करें, तो देश की राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई की तस्वीरें भयावह हैं.

राजधानी दिल्ली में सीएम केजरीवाल ने दिल्ली के अस्पतालों में बाहरी लोगों के इलाज पर बैन लगा दिया है. अब दिल्ली में केंद्र सरकार के अस्पतालों में ही बाहरी लोगों का इलाज होगा. ये वही केजरीवाल हैं जिनका दावा था कि दिल्ली के स्वास्थ्य ढांचे की चर्चा संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका तक में हो रही है. इनका दावा ये भी था कि दिल्ली सरकार हर हालात से निपटने के लिए तैयार है. दिल्ली के इसी महान सीएम ने एक दिन में 10 लाख लोगों को खाना खिलाने का दावा किया था. सीएम साहब के इस दावे के बावजूद हजारों मजदूर दिल्ली से पैदल ही अपने घरों के लिए रवाना हो गए. दिल्ली में ये लेख लिखे जाने तक 17 हजार एक्टिव केस हैं और दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था की चरमराहट सीएम के हालिया फैसले में महसूस की जा सकती है.

लद्दाख: भारत को अगर चीन से पार पाना है तो समुद्र में अपनी ताकत बढ़ानी पड़ेगी

पत्रकार शाहिद सिद्दीकी की भतीजी की कोरोना से कल मौत हो गई. शाहिद सिद्दीकी ने ट्विटर पर इसकी जानकारी देते हुए लिखा.

शाहिद इससे पहले भी एक ट्वीट में बता चुके थे कि उनकी भतीजी को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल दौड़ाया जा रहा है. उसे एडमिट तक नहीं किया जा रहा है. शाहिद सिद्दीकी बड़े पत्रकार हैं. बड़े लोगों में उनकी जान-पहचान है. फिर भी उन्हें इस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा. सोचिए आम लोगों की हालत क्या हो रही होगी. वो हालत भी किसी से ज्यादा छुपी नहीं है. ट्विटर पर ऐसे ही लोगों के वीडियो सामने आ रहे हैं. लोगों की हालत खराब होती है, लेकिन अस्पताल टेस्ट पॉजिटिव आने तक इलाज शुरु नहीं करते. टेस्ट का रिजल्ट कब आएगा, इसका कुछ पता नहीं है. 72 घंटे का समय दिया जाता है लेकिन 120 घंटे बाद भी रिपोर्ट आ जाए, तो बड़ी बात है. अस्पतालों के अंदर, गंदगी बिखरी पड़ी है. दिल्ली के अस्पतालों के हालात खराब हैं.

मुंबई में हालात पहले से ही खराब हो चुके थे. ट्विटर की कथित बेस्ट सीएम रेस में सबसे आगे चलने वाले उद्धव के ठाकरे राज में कुछ भी, कभी भी कंट्रोल में नहीं दिखाई दिया. हां मीडिया का एक वर्ग, और बॉलीवुड ज़रूर अपने सीएम साहब की पीठ थपथपाता नजर रहा. ये, महोदय भी मजदूरों को रोटी और मकान का वादा पूरा करने में नाकाम रहे. जब मजदूर पैदल चलने लगे तो केंद्र पर भी ठीकरा फोड़ते नज़र आए. फिलहाल इनकी पार्टी के प्रवक्ता संजय राउत के कोपभाजन के ताजा शिकार अभिनेता सोनू सूद बने हैं. राउत जी इस बात से नाराज हैं कि जो काम उनकी सरकार नहीं कर सकी, भला वो काम सोनू सूद ने कैसे कर दिया. संजय राउत के मुताबिक सोनू सूद बीजेपी की फिल्म के बनाए हुए हीरो हैं. मुंबई की हालत भी वही है, जब तक टेस्ट पॉजिटिव न आए, तब तक इलाज शुरू नहीं होगा. कोरोना से तड़पते एक पुलिसकर्मी का ऐसा ही वीडियो सोशल मीडिया पर एबीपी न्यूज के रिपोर्टर अजय दुबे ने शेयर किया है.

दिल्ली और मुंबई की हालत ये है, तो बाकी देश तो वैसे भी भगवान भरोसे रहता ही है. राजनीतिक मोर्चे पर खबर ये है कि बिहार का चुनाव नजदीक है. गृहमंत्री अमित शाह ने कल बिहार में एक वर्चुअल रैली को संबोधित किया. अमित शाह जी ने कहा कि बिहार चुनाव से उनकी रैली का कोई संबंध नहीं है. दरअसल अमित शाह जी की इस बात का सच से कोई संबंध नहीं है. मीडिया के मुताबिक बिहार चुनाव को लेकर सरगर्मी 'तेज' हो गई है. ट्विटर पर पत्रकारों की टाइमलाइन पर बिहार के छुटभैय्या नेताओं की भी चर्चा शुरु हो गई. सवाल पूछा जाना चाहिए कि सरगर्मी तेज किसने की है? सब कुछ दिखाने की जिम्मेदारी मीडिया की है. देश गंभीर संकट से जूझ रहा है, लोग मर रहे हैं, और सरगर्मी बिहार में राजनीति की तेज है. दरअसल हम सब एक भयानक दौर में पहुंच चुके हैं, जहां सभी ताकतवर लोग अपनी मनमानी करने पर तुले हैं. इन ताकतवर लोगों में सत्ता, विपक्ष, मीडिया और थोड़ी भी ताकतवर जनता भी शामिल है.

भारत में हाशिये पर चल रहा एक वर्ग चीन और भारत की तनातनी से खुश हो रहा है

देश के 'यशस्वी' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के रहते ही देश ने मजदूरों की दुर्दशा देखी. सड़कों पर रोज मजदूरों की मौत की खबरें आती रहीं और 2 महीने तक इनका कोई उपाय नहीं हुआ. एक दिन 'मन की बात' में मोदी जी ने इस दर्द को शब्दों में बयां न कर पाने की बात कहकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली. कोई मोदी जी को बताए कि ये दर्द झेलना ना पड़े, इसलिए 6 साल पहले देश ने आपको चुना था. 2019 में उससे भी ज्यादा मजबूती से चुना. अगर देश को सिर्फ दुख जताने वाला पीएम ही चाहिए होता, तो मनमोहन सिंह की आवाज मोदी जी से बहुत बेहतर थी.

मजदूरों की दुर्दशा, भारत में कोरोना संकट का पहला चरण था. मोदी जी ने बैठे बैठे ही सब कुछ शांति से होने दिया. देश में कोरोना संकट का दूसरा चरण शुरु हो चुका है. अस्पतालों की हालत खराब है, लोगों को अस्पतालों में एडमिट नहीं किया जा रहा. आने वाले दिनों में हालात और भी खराब हो सकते हैं. मोदी जी शांत हैं और लॉकडाउन में ढील देते जा रहे है, लगता नहीं कि आगे भी केंद्र की तरफ से कड़े कदम उठाए जाएंगे या लोगों को राहत दी जाएगी.

देश के हालात भगवान भरोसे हो चुके हैं. छोटे शहरों में लोग घरों से बाहर, बड़े आराम से निकल रहे हैं. खतरा बढ़ चुका है लेकिन लोगों को सावधान करने वाले खुद नदारद हैं. कोरोना के खिलाफ भारत ने लड़ाई की शुरुआत बड़े जोर शोर से की थी. उत्साह देखकर लगा भी था कि वाकई भारत इस संकट से आासानी से पार पा लेगा. लेकिन आपका DNA पीछा नहीं छोड़ता. भ्रष्ट राजनेता, खराब स्वास्थ्य व्यवस्था, बिखरा फेडरल सिस्टम, और लापरवाह लोग भारत के DNA में हैं और वो चीजें कोरोना संकट के आगे बढ़ने के साथ उभर कर सामने आती जा रही हैं.

केरल: विस्फोटक से भरा फल खिलाने से घायल गर्भवती हथिनी की भूख प्यास से मौत

फिल्मों में आपने अक्सर एक मजबूत किला देखा होगा. कहानी होती है कि अगर दुश्मन किले के अंदर दाखिल हो गया, तो तबाही तय है. कोरोना हमारे किले में घुस चुका है, पहरेदार सो रहे हैं. ऐसे में कोरोना की जब मर्जी होगी, तब वो तबाही मचाकर खुद वापस चला जाएगा. तब तक के लिए, कोशिश करिए किसी सुरक्षित कोने में बंद हो जाइए और वाकई ईश्वर से प्रार्थना करिए कि सब कुछ ठीक हो जाए. खुद को कोरोना से बचाना ही एकमात्र विकल्प है.