बिहार में अब तक चमकी बुखार से 156 बच्चों की मौत हो चुकी है. मुजफ्फरपुर इससे सबसे ज्यादा प्रभावित है. यहां सबसे ज्यादा बच्चों की मौत हुई है. स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल उठ रहे हैं. बिहार में इस बुखार का कहर नया नहीं है 2012, 2014 के बाद एक बार फिर से बुखार से बच्चे बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं. ऐसा नहीं है कि बीच के सालों में बुखार का असर नहीं रहा है लेकिन ऊपर बताए गए सालों की अपेक्षा कम जरूर है. आखिर बिहार में इस त्रासदी के गुनहगार कौन कौन लोग हैं. वो कौन कौन लोग हैं जिन्होंने अगर अपना काम ठीक से किया होता तो इस त्रासदी से बचा जा सकता था और कम से कम इसके प्रभाव को कम किया जा सकता था.

1. बिहार सरकार- पूरी त्रासदी को देखें तो पता चलता है कि मुजफ्फरपुर और पूरा बिहार इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे. अस्पतालों की व्यवस्था चौपट थी. वहां न तो पूरे बेड थे और नहीं ICU तक में बिजली की व्यवस्था थी. सभी को पता था कि इस सीजन में बुखार जोर पकड़ता है फिर भी सरकार ने कोई तैयारी नहीं की. एक एक बेड पर जिस तरह से 4 बच्चों का इलाज चल रहा था और डॉक्टरों की कमी ने भी इस समस्या को और खराब करने में कोई कसर नहीं रखी. टीवी 9 भारतवर्ष की रिपोर्ट में अजीत अंजुम ने बताया कि दवाइयां भी अस्पतालों में पूरी नहीं है. इससे साफ होता है कि बिहार सरकार ने चमकी बुखार के कहर से निपटने के लिए कोई तैयारी नहीं की थी. खास बात ये है कि सरकार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय इस त्रासदी के हालात में भारत पाकिस्तान मैच का स्कोर पूछ रहे थे. ये दिखाता है कि किन असंवेदनशील हाथों में बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था है. एक सामान्य शिष्टाचार वश ही मंत्री महोदय ऐसा करने से बच सकते थे. जाहिर तौर पर बिहार में बच्चों की मौतों के लिए बिहार सरकार पूरी तरह से जिम्मेदार है.

2. केंद्र सरकार- केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन 2014 में भी स्वास्थ्य मंत्री थे. उन्होंने तब एक कमेटी बनाई थी जो इंसेफेलाइटिस से निपटने के लिए काम करती. इस कमेटी की एक भी बैठक पिछले पांच साल में नहीं हुई. खास बात है कि बीते साल गोरखपुर में इसी इंसेफेलाइटिस के कहर से बच्चों की बड़ी तादाद में मौत हुई थी. आज की बिहार की त्रासदी की तरह वो भी काफी चर्चा में रही थी. यूपी में उस समय योगी आदित्यनाथ की सरकार बन चुकी थी और गोरखपुर उनका गढ़ था. इस त्रासदी के बावजूद केंद्रीय कमेटी की कोई बैठक नहीं हुई. ये दिखाता है कि इस बीमारी से लड़ना केंद्र सरकार के एंजेंडे में था ही नहीं. पीएम मोदी ट्विटर पर खासे सक्रिय रहते हैं. वो तमाम मुद्दों पर ट्वीट करते हैं. उन्होंने शिखर धवन के क्रिकेट विश्वकप से बाहर होने पर ट्वीट किया लेकिन मुजफ्फरपुर पर आज भी उन्होंने एक ट्वीट तक नहीं किया. हो सकता है कि वो इसे लेकर आंतरिक तौर पर अभी गंभीर हों कुछ काम कर रहे हों लेकिन उनकी चुप्पी कोई बेहतर संकेत नहीं देती. जाहिर तौर पर केंद्र सरकार भी इस त्रासदी की एक हिस्सेदार है.

3. मीडिया- बिहार की इस त्रासदी की रिपोर्टिंग काफी चर्चा में रही. आज तक की एक पत्रकार का डॉक्टर से उलझते हुए एक वीडियो भी खूब वायरल हुआ. बिहार में जब हर साल बच्चों की मौत होती है तो ये वहां के लोगों के लिए एक मुद्दा बन सकता था. हाल ही में लोकसभा चुनाव हुए. शायद ही किसी मीडिया चैनल पर बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर कोई रिपोर्ट चली हो. चुनाव छोड़िए आम तौर पर भी ऐसा नहीं दिखता. सरकार को जगाए रखना मीडिया का काम है न कि आईसीयू में जाकर डॉक्टरों से उलझ कर बच्चों के इलाज में बाधा डालना. अगर कोई इस समस्या को लेकर गंभीर था तो इस मौसम से पहले ही जाकर उसे रिपोर्ट करना चाहिए था कि बिहार के अस्पताल इस त्रासदी से निपटने के लिएकितने तैयार हैं. आप उस वक्त नेताओं के भाषण और तमाम फर्जी सियासी खबरें चलाने में सक्रिय थे अब बच्चों की मौत हो रही है तो अस्पतालों में जाकर ड्रामेबाजी हो रही है. बेशक कितने भी तर्क दिए जाएं लेकिन मीडिया भी बिहार की इस त्रासदी और बच्चों की मौत एक जिम्मेदार है.