प्याज का दाम 100 रुपये से लेकर 120 रुपये तक है. आलू भी 40-50 रुपये किलो हो चुका है. दूध के दाम भी बढ़े हैं. देश में कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है. राजधानी दिल्ली में ही ठंड में ठिठुरते लोग मिल जाएंगे. इसी राजधानी दिल्ली में कुछ दिन पहले 43 मजदूरों की सरकारी लापरवाही की वजह से मौत हो गई और इसी राजधानी में आज से करीब एक साल पहले 3 बच्चियों ने भूख से तड़प तड़प कर जान दे दी. ये सब कुछ सुनना आसान लगता है. देखना भी आसान है बस लोगों को इन सबके नाम पर भड़काना कठिन है. भारत में एक नया संविधान लिखने की जरूरत है. इस संविधान में आलू-प्याज और दूध से लेकर मौत तक का धर्म तय कर दिया जाए ताकि लोगों को इनके नाम पर भड़काया जाए. उन्हें सड़क पर पत्थरबाजी करने के लिए मजबूर किया जाए ताकि सरकार इन समस्याओं पर भी ध्यान दे सके.

ऊपर जिन 43 मजदूरों का जिक्र हुआ है, उनकी मौत एक फैक्ट्री में आग लगने से हुई. फैक्ट्री ऐसी थी कि धुआं निकलने तक की जगह नहीं थी. अधिकतर मजदूर दम घुटने की वजह से मारे गए. मारे गए मजदूरों में अधिकतर मुसलमान थे और बिहार के रहने वाले थे. इन 43 लोगों की मौत की कीमत दिल्ली और केंद्र सरकार ने मुआवजा देकर अदा कर दी. इनकी मौत पर सियासत नेता लोगों तक सीमित रही. टेलीविजन और सोशल मीडिया पर इनकी मौत की खबर 12 घंटे से ज्यादा टिक नहीं सकी. हिंदू तो छोड़िए एक झूठी खबर पर उबल पड़ने वाले मुसलमान इन 43 लोगों की मौत पर शांत रहे. CAA पर हिंसक प्रदर्शनों को देखकर इन मजदूरों की आत्मा भी खुद से पूछ रही होगी कि हमारे मुस्लिम होने में क्या कोई कमी थी ? हमारी मौत पर तो सब खामोश रहे.जिस इलाके में इनकी मौत हुई वहां ऐसी तमाम फैक्ट्रियां चलती हैं. सरकार ने मुआवजा दिया और जिम्मेदारी से मुक्त हो गई. न मुसलमान सड़कों पर उतरे और न ही किसी राजनीतिक पार्टी ने इसकी सुध ली कि दोबारा ऐसा हादसा न हो, सभी शायद एक बार फिर से हादसे के इंतजार में बैठे हैं.

देश भर में हिंदू-मुसलमान की सियासत चरम पर है. वाट्स एप पर फैलाए जा रहे जहर का शिकार सब हो रहे हैं. नेता लोग राजनीति की गर्म आंच में अपनी रोटियां सेंक रहे हैं और भरी ठंड में देश के न जाने कितने गरीब फटे-चिटे कपड़ों के सहारे ठंड गुजारने को मजबूर हैं. इनमें हिंदू भी होंगे और मुसलमान भी होंगे लेकिन इनके नाम की सियासत कठिन है. इनकी मौत पर किसी का खून उबाल नहीं मार सकता. हिंदू-मुस्लिम चाहें तो इसमे भी बंटवारा कर लें, हिंदू हिंदुओं के लिए जाड़ा काटने का सहारा बन जाए और मुसलमान मुसलमानों का, लेकिन दुर्भाग्य इस देश का ये है कि यहां मार काट के लिए हाथ ज्यादा उठते हैं, मदद के लिए कम.

आलू-प्याज और दूध जैसी दैनिक जरूरतों की चीजें महंगी होंगी तो सीमित आय वालों की दिक्कतें बढ़ेंगी. स्कूलों की फीस अलग बढ़ चुकी हैं. हमारे सामने ऐसे तमाम मुद्दे हैं जो हमें बगैर किसी हिचक के उठाना चाहिए. सरकार को वोट देना और उसके किसी कदम का विरोध करना दो अलग अलग बातें हैं. आप 5 साल बाद इसी सरकार को फिर से वोट दे सकते हैं लेकिन सत्ता में रहते ये आपके लिए लाभकारी हो, इसके लिए विरोध तो किया ही जा सकता है लेकिन हम हिंदू-मुस्लिम में खोए पड़े हैं. इन तमाम समस्याओं का एक ही हल है. सारी समस्याओं का हिंदू-मुस्लिम के नाम पर नामकरण कर दिया जाए ताकि लड़ने और लड़ाने वालों के एजेंडे में ये समस्याएं भी शामिल हो सकें. शायद आम आदमी की समस्याओं की देश में एकमात्र यही हल है.