आजकल सोशल मीडिया में 'नोटा' शब्द काफी प्रचलित हो रहा है। अनारक्षित जाति से आने वाले लोग सोशल मीडिया में नोटा का जोर शोर से प्रचार करने में लगे है। कुछ विपक्षी पार्टियों की सोशल मीडिया सेल भी छदम भेष में सरकार के विरोध में हवा बनाने और नोटा का प्रसार करने में लगी हुई है, सरकार पर दबाव भी बढ़ रहा है क्यों की चुनाव में एक साल से भी कम का समय है। ऐसे में मोदी सरकार हर कदम फूँक फूँक कर चल रही है। कई बार ज्यादा आत्मविश्वास ना चाहते हुए भी आप को ऐसे गलती करने पर मजबूर कर देता है जो सब कुछ सही होते हुए भी खेल की बाजी आपके हाथ से निकाल देता है।

SC/ST एक्ट पर मोदी सरकार का चला गया दांव कुछ ऐसा ही निर्णय मालूम हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले द्वारा किये गए सुधारों को पलटते हुए मोदी सरकार ने अपने आप को दलितों का सबसे बड़ा हितेषी साबित करने की कोशिश की। अगर आप मोदी के 2014 से दिए गए भाषणों को सुने तो मोदी ने भीम राव आंबेडकर की महिमा मंडन कुछ इस तरह किया की गाँधी भी उनके आगे छोटे मालूम पड़ने लगे। वोट के इस दौर में गाँधी की विचारधारा किसी जाति या वोट बैंक को आकर्षित भी नहीं करती तो ऐसा करने में बहुत आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए। बीजेपी और मोदी सरकार को ये लग रहा था की तथाकथित सवर्ण समुदाय के पास बीजेपी को वोट करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है और अगर इसमें दलितों के वोट को जोड़ लिया जाये तो 2019 का रास्ता सुबह सुबह नास्ते में किये जाने वाले सूजी के हलवे जैसा आसान हो जायेगा पर शायद वो ये भूल गए की कई बार गर्मागर्म हलवे को जल्दी खाने के चक्कर में इंसान अपना मुँह भी जला बैठता है।

एक ऐसा समुदाय जो वर्षो से आरक्षण पर इस लिए चुप्पी साध के बैठा रहा क्यों की दलितों के साथ सैकड़ो सालों से अत्याचार हुए, उनका प्रतिनिधित्व नहीं रहा और शिक्षा के सामान अवसर गरीबी की वजह से नहीं मिले। सरकारी नौकरियों में मिलने वाले आरक्षण पर तथाकथित सवर्ण जातियों की तरफ से एकजुट विरोध देखने को कभी नहीं मिला। पर आरक्षण पर विरोध की सुगबुगाहट तब तेज हुई जब निजी सेक्टर की नौकरियों में भी आरक्षण की बात शुरू हुई, फिर प्रमोशन में आरक्षण की बात ने आग में घी का काम किया।

पिछले पचास सालों में सवर्ण कहे जाने वाले जातियां भी गरीबी और बेरोजगारी की मार से अछूती नहीं रही है। इस समुदाय के गरीब बच्चो को भी स्कूल कॉलेज की पढ़ाई के लिए आरक्षित वर्ग से कई गुना ज्यादा फीस देने पड़ती है। ये चाहे प्रोफेशनल कोर्स की बात हो या सामान्य स्कूल कॉलेज में एडमिशन के समय दी जाने वाली फॉर्म फीस हो। जंहा एक तरफ सरकारी बाबू के पद पर तैनात आरक्षित जाति से आने वाले पिता का बेटा 200 रुपए फीस देता है वंही गरीबी की मार झेल रहे सामान्य वर्ग का व्यक्ति का बेटा 1000 रूपये फीस दे रहा है। ये ठीक उसी तरह से है की एक वर्ग के लिए ऐसा माहौल पैदा कर दिया जाये की उसे शिक्षा से ही वंचित कर दिया जाये।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में प्रमोशन में आरक्षण पर कहा की दलित समुदाय हजारों सालो से वंचित और पीड़ित है, पर सवाल ये है की अगर एक वर्ग पीड़ित और वंचित रहा है तो उसे आगे करने के लिए दूसरे वर्ग से उसके मौलिक अधिकार भी ले लिए जाये। सरकारों को ये समझना होगा की गरीबी और बीमारी जाति, धर्म, समुदाय देख कर नहीं आती। पिछले आमचुनाव में सवर्ण जातियों के लगभग 54 प्रतिशत मत बीजेपी को मिले थे और 11 प्रतिशत कांग्रेस को। शायद इन्ही आंकड़ों की वजह से अति उत्साह में बीजेपी गलती करते हुए मालूम होती है।