बीते दिनों दिल्ली का जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय यानि जेएनयू एक बार फिर से चर्चा में रहा. पिछले कुछ सालों में लगातार इस विश्वविद्यालय का नाम विवादों में रहा. कभी भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारों के लिए तो कभी एक छात्र के गायब होने के लिए. ताजा विवाद फीस में इजाफा और उसके विरोध में हुए प्रदर्शन को लेकर खड़ा हुआ है. इस ताजा घटनाक्रम की एक एक घटना के बारे में हम बात करेंगे और उसके जरिए जेएनयू को समझने की कोशिश करेंगे.

जेएनयू में हालिया विवाद हॉस्टल समेत कई फीस बढ़ाने, ड्रेस कोड लागू करने और हॉस्टल में आने वाले समय को लेकर खड़ा हुआ. छात्रों का आरोप है कि फीस में इजाफे को उन्होंने वाइस चांसलर से मिलने की कोशिश की. वाइस चांसलर जगदीश कुमार ने उन्हें मिलने का समय नहीं दिया. उनकी मांगी सुनी नहीं गई और उसके बाद छात्रों का विरोध जेएनयू से बाहर दिल्ली की सड़कों तक आ पहुंचा. विरोध प्रदर्शन जबरदस्त थे. खास बात ये है कि प्रदर्शन में सत्ताधारी बीजेपी का छात्र संगठन एबीवीपी भी शामिल था. प्रदर्शन छात्रों की तरफ से शांतिपूर्ण था. हालांकि पुलिस ने छात्रों पर पानी की बौछार की. कुछ छात्रों को हिरासत में लेकर थाने भी ले जाया गया. इन विरोध प्रदर्शनों के बाद प्रशासन झुका और उसने फीस में इजाफे को वापस ले लिया. हालांकि छात्रों ने इसे महज दिखावा बताया.

छात्रों के विरोध प्रदर्शन के जरिए अगर जेएनयू को देखा जाए तो एक सकारात्मक पक्ष दिखाई पड़ता है. अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहने का संदेश भी देता है. बीते कुछ सालों में सरकारी संस्थानों जैसे आईआईटी, टीएसएस , आईआईएमसी में फीस में लगातार इजाफा हुआ है. हम जानते हैं कि प्राइवेट संस्थानों में वैसे भी फीस की लूट होती है. ऐसे में ये सरकारी संस्थान ही गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों की उम्मीद होते हैं. अगर ये उम्मीद भी इन छात्रों से छीन ली जाएगी तो आखिर बचेगा क्या ? आखिर लोकतंत्र में सबको शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का हक है और छात्रों ने वही किया. दरअसल जेएनयू के जरिए ही देश में शिक्षा के निजीकरण और महंगाई का मुद्दा उठना चाहिए था, हालांकि ऐसा नहीं हो सका. फिर भी ये अच्छी बात है कि छात्रों ने विरोध किया और उसका परिणाम भी सार्थक हुआ. भारत के लोगों को इन छात्रों से सीख लेनी चाहिए. जिन पर समय समय पर तुगलकी फरमान थोप दिए जाते हैं और हम चुपचाप बर्दाश्चत कर जाते हैं.

अब इसी घटनाक्रम की दूसरी घटना पर आते हैं. इसी प्रदर्शन के दौरान जेएनयू में लगी विवेकानंद की मूर्ति से छेड़छाड़ हुई. इसके आस पास अपशब्द लिखे गए. वैसे तो यह घटना जांच का विषय है और समय आने पर हो सकता है कि हमें इसके दोषियों का पता भी चले लेकिन फिर भी हम इसकी तह में जाने की कोशिश करते हैं. जेएनयू को वामपंथियों का गढ़ कहा जाता है. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इस समय भारत के सबसे कट्टर वामपंथी इसी संस्थान में हैं. भगवा रंग से इन वामपंथियों का एक अलग ही आंकड़ा है. भगवा रंग से ऩफरत के नाम पर ये लोग विवेकानंद को भी निशाना बना सकते हैं, वैसे भी वामपंथी मार्क्स और लेनिन को ही अपना हीरो मानते हैं.ऐसे में भगवा कपड़े से ढकी मूर्ति से छेड़छाड़ का पहला शक इन्हीं वामपंथियों पर जाता है. चूंकि लोगों का कहना है कि यह घटना आंदोलन से ध्यान हटाने की एक साजिश हो सकती है तो सीधी सी बात है कि उनका आरोप सत्ताधारी दल की तरफ है. अब जबकि एबीवीपी खुद आंदोलन का हिस्सा थी तो ध्यान हटाने का काम कौन करेगा ? इतने बड़े संस्थान में जहां दिन रात चहल पहल रहती हो तो कोई बाहरी आकर तो यूंहि कुछ भी कर नहीं जाएगा. जाहिर तौर पर यह संगठित तौर पर किया गया कृत्य लगता है. फिर से कहना वही है कि वैसे तो जांच में सामने आएगा कि ये कृत्य किसका है लेकिन अभी इशारा वामपंथियों की तरफ ही जाता है. जेएनयू में घटी यह घटना हमें बताती है कि इतना बड़ा संस्थान आज भी कुछ मामलों में कितना असहिष्णु और अपरिपक्व है जो स्वामी विवेकानंद जैसे प्रेरणादायी और आध्यात्मिक व्यक्तित्व को भी निशाना बनाता है.

अब तीसरी घटना पर आते हैं. इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर खासा वायरल हो रहा है. वीडियो में जेएनयू के कुछ छात्र जी न्यूज की महिला पत्रकार के साथ अभद्रता और हाथापाई तक करते नजर आते हैं. वीडियो में एक छात्र को कहते है सुना जा सकता है, "घेरो मत...मजे लो... एक महिला के लिए इस तरह के शब्द छेड़छाड़ की श्रेणी में आते हैं. जी न्यूज पर बीजेपी के चैनल, दलाल चैनल जैसे आरोप लगते हैं. आप इन आरोपों से सहमत या असहमत भी हो सकते हैं लेकिन एक महिला के साथ इस तरह का व्यवहार वामपंथी छात्रों की कुंठित मानसिकता को दर्शाता है. खास बात यह है कि यही वामपंथी ट्विटर पर महिलाओं को गाली दिए जाने का मुद्दा जोर शोर से उठाते हैं और खुद समय आने पर इस तरह की अभिव्यक्ति का प्रदर्शन करते हैं. इस घटना के जरिए हमें फिर एक बार जेएनयू की असहिष्णुता का परिचय मिलता है. इस घटना के जरिए हमें पता चलता है कि जेएनयू में ऐसे लोग भी हैं जिनके लिए विचारधारा, इंसानियत से भी ऊपर है. वही इंसानियत जिसका हवाला देकर यहां जी न्यूज और रिपब्लिक को गालियां दी जाती हैं.