रोटी के अंदर दबा आलू का भरता, वो भी गर्मी में दोपहर तक खराब हो जाता है. ये वो खाना है जो कुछ दिनों पहले तक दिल्ली के बिजवासन में एक NGO के जरिए लाया जाता था. लॉकडाउन के दिनों में प्रवासी मजदूरों को ये खाना दिन में एक बार मिल पाता था. फिलहाल ये खाना भी आना बंद हो चुका है. सरकार की तरफ से खाने का कोई इंतजाम नहीं. प्रवासी मजदूर हैं, राशन कार्ड है नहीं इसलिए राशन का भी इंतजाम नहीं. लॉकडाउन बढ़ता जा रहा है, राशन खत्म होता जा रहा है और चिंता बढ़ती जा रही है. मकान मालिक किराया देने का दबाव बना रहे हैं. एक इंसान को जिंदा रहने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरत होती है. खासतौर से अगर कोई प्रवास में है और इसे इन तीनों चीजों की कमी हो, तो वो क्या करेगा ? वापस अपने घर की और लौटेगा.

ऊपर इन हालातों का जिक्र इसलिए किया गया ताकि ये समझने में आसानी हो कि मजदूर अपने प्रवासी ठिकानों को छोड़कर घर की ओर क्यों रवाना हो रहे हैं. किन हालातों में महाराष्ट्र के औरंगाबाद में 16 मजदूरों की ट्रेन से कटकर मौत हो गई. सवाल उठा कि भला मजदूर ट्रेन की पटरियों पर सो क्यों रहे थे. उन मजदूरों को क्या मालूम था कि जो ट्रेन उन्हें उनके घर पहुंचाने के लिए ना चल सकी, वो उनकी मौत बनकर पटरी पर दौड़ने लगेगी. रोड पर छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं के साथ मजदूर अपने घरों की ओर चलते जा रहे हैं. हजारों किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करने लोग निकल पड़े हैं. कोई साइकिल से मुंबई से गोरखपुर आ रहा है तो कोई दिल्ली से बिहार जा रहा है.

दिल्ली के बिजवासन में फँसे सैकड़ो मज़दूर परिवार कोरोना से जान बचाएं या भुखमरी से

पिछले डेढ़ महीने से देश के हालात ऐसे ही हैं. तस्वीरें एक जैसी ही हैं.देश की सरकारें इस डेढ़ महीने में कोई योजना बनाने में नाकाम रही हैं. सरकारें मजदूरों को ये भरोसा दिलाने में नाकाम रही हैं कि उन्हें भूखा नहीं मरने दिया जाएगा. सरकारों ने लॉकडाउन के बीच गरीबों को मरने के लिए छोड़ दिया है. वो आज कोरोना से नहीं मर रहे हैं तो या तो ट्रेन से कटकर या भूखे मर रहे हैं. सरकार ही नहीं समाज ने भी गरीबों के साथ अन्याय किया है. उन मकान मालिकों को क्या कहा जाए जो भूखे पेट लोगों से किराए के पैसे मांग रहे हैं और उन्हें मकानों से निकाल रहे हैं.

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कोरोना की वजह से लॉकडाउन का ऐलान किया गया. लॉकडाउन का मतलब था कि जो जहां था, वहीं रहे. लॉकडाउन के ऐलान के वक्त ये सोचा जाना चाहिए था कि रोज कमाकर खाने वाले एक बड़े वर्ग को इससे समस्या होने वाली है. इस वर्ग का लॉकडाउन के दौरान क्या होगा ये सोचा जाना चाहिए था. लॉकडाउन के शुरुआत में ही मजदूरों का एक बड़ा वर्ग घरों की ओर निकल पड़ा था. दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली में 10 लाख लोगों को खाना खिलाया जा रहा है. सीएम साहब से पूछना चाहिए कि ये जो लोग पैदल और साइकिलों पर घर जाने को तैयार हैं क्या वो भी इन 10 लाख का हिस्सा हैं ? अगर 10 लाख में शामिल हैं तो क्या इन्हें पैदल हजारों किलोमीटर जाने का शौक है ?

कोरोना से लेकर लॉकडाउन तक के इस पूरे घटनाक्रम में एक बात फिर साफ हो चुकी है कि गरीब आज भी सरकारों की प्राथमिकता में सबसे नीचे है. जो योजनाएं गरीबों को प्राथमिकता में रखकर बननी चाहिए उनमें गरीब ही नजर नहीं आ रहा है. साफ शब्दों में कहें तो बीते डेढ़ महीने में सरकारों की कमजोर इच्छाशक्ति ही देखने को मिली है. देश के प्रधानमंत्री के 56 इंच के सीने की ताकत और एक चाय वाले के बेटे के गरीबी का दर्द दोनों ही सरकार के तौर तरीके से गायब नजर आ रहे हैं.