यूपी में एक सोनभद्र जिला है. इस जिले में कई गांवों के लोग फ्लोरोसिस नाम की बीमारी से काफी ज्यादा प्रभावित हैं. जवान लोग बूढ़े दिखते हैं. बीमारी की वजह से बेरोजगार हैं. फ्लोरोसिस से ग्रसित व्यक्ति के दांत ख़राब हो जाते हैं और हाथों व पैरों की हड्डियां टेढ़ी हो जाती हैं, जिसके कारण वह चलने फिरने से लाचार हो जाता है.यह बीमारी बच्चों से लेकर अधिक उम्र वाले व्यक्ति को अपनी चपेट में ले लेती है. बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को ये बीमारी होने का कारण पानी में फ्लोराइड की मात्रा का ज्यादा होना है और ये मात्रा सोनभद्र में औद्योगिक कचड़े की वजह से ज्यादा है.

आप अगर बीते 12-15 साल के अखबारों में खोजने बैठ जाएंगे तो आपको इस त्रासदी की खबर आसानी से पढ़ने को मिल जाएगी. हमने बगैर ज्यादा मेहनत किए गूगल पर सर्च किया और 2014 में लाइवमिंट नाम की एक वेबसाइट ने सोनभद्र की इस समस्या पर लिखा था. इसके अलावा बीबीसी जैसी वेबसाइट या जागरण जैसे अखबार में इस समस्या के बारे में हर साल एक आध बार लिखा जाता है. मीडिया की इतनी कवरेज के बावजूद हर साल ये समस्या पढ़ने को जरूर मिलती है. चूंकि हमने बीते 15 सालों के अखबार चेक करने की बात कही इसलिए ये जाना जा सकता है कि इतने सालों में समस्या को खत्म करने का प्रयास नहीं हुआ. क्या दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते देश के लिए शर्मनाक विषय नहीं है कि हर साल हम अखबारों/वेबसाइटों में एक जगह पर पानी के प्रदूषण जैसी समस्या पढ़ने के बावजूद आज तक दूर नहीं पाए.

यूं तो हमने अखबारों में खबर की बात की है लेकिन गांव कनेक्शन की रिपोर्ट बताती है कि सोनभद्र में इस समस्या का पता 1980 में ही चल गया था. आज 2019 है और इंदिरा गांधी के जमाने से आज हम मोदी युग में आ चुके हैं लेकिन सोनभद्र के लोगों को पीने के पानी के नाम पर जहर पीने को ही मजबूर होना पड़ रहा है. इतने सालों में समस्या के निदान के नाम पर यहां के हैंडपंपों में फिल्टर लगाए गए जो देखरेख की कमी की वजह से खराब हो गए. एक वक्त के बाद इन्हें बदला जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ और समस्या जस की तस.

सोनभद्र और उसके लिए लोगों के लिए अभिशाप बन चुकी इस समस्या का जिक्र आज हमने इसलिए किया क्योंकि बिहार में हाल ही में 150 से ज्यादा बच्चों की मौत हुई. वजह 15 साल से क्षेत्र में हर सीजन फैलने वाला बुखार था. पहले भी यह एक त्रासदी बन चुका था लेकिन फिर भी इससे निपटने की कोई तैयारी नहीं दिखी. जब अचानक बुखार का कहर बरपा तो सरकार से लेकर मीडिया और आम लोगों ने हाहाकरा मचा दिया. कहीं ऐसा न हो कि अचानक सोनभद्र में भी इसी तरह की त्रासदी हो जाए और फिर सिवाय संवेदना जताने और हाहाकार करने के कुछ नहीं बचे. संवेदना तो शायद वैसे भी शायद ही किसी में हो वर्ना अब तक इस समस्या का कुछ तो स्थायी हल निकल चुका होता.

लोकसभा में 30 मार्च 2017 को बीजेपी सांसद महेश गिरी ने पेयजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की बढ़ी मात्रा होने का मुद्दा उठाया था. तब केंद्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने देश को 2021 तक इस समस्या से निजात दिलाने की बात कही थी. उन्होंने कई योजनाओं का हवाला दिया था. 2019 आधा निकल चुका है 2021 में डेढ़ साल का वक्त बाकी है देखने वाली बात होगी कि तोमर जी कि ऐसी कौन सी योजना होगी जो 1980 से चली आ रही इस समस्या अचानक अंत कर देगी.