जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कई तरह के प्रतिबंध लगे हुए है. अफवाहें फैलने से रोकने के लिए इंटरनेट और टेलीफोन सेवाओं पर प्रतिबंध हैं. अभी भी धारा 144 लागू है. स्कूल कॉलेज खुले हैं लेकिन डर के मारे लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज रहे हैं. कुछ इलाकों में लोगों को दुकानें खोलने का आदेश भी दिया गया था हालांकि डर की वजह से ही लोगों ने दुकानें भी नहीं खोली. इसी बीच जम्मू कश्मीर को लेकर तमाम तरह की रिपोर्टिंग हो रही है. भारतीय मीडिया की एक रिपोर्टिंग है, मेनस्ट्रीम मीडिया से अलग डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनी रिपोर्टिंग कर रहे हैं और अतंर्राष्ट्रीय मीडिया भी रिपोर्टिंग कर रहा है.

भारतीय मीडिया पर आरोप लग रहा है कि वो कश्मीर की सही तस्वीर नहीं पेश कर रहा है. आरोप लगाने वालों का कहना है कि वहां प्रदर्शन हो रहे हैं, पत्थरबाजी हो रही है, लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है लेकिन ये कुछ भी दिखाया नहीं जा रहा है. भारत के कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिपोर्टिंग में दावा किया जा रहा है कि वहां कश्मीर में हालात सामान्य नहीं हैं और अतंर्राष्ट्रीय मीडिया भी कुछ इसी तरह के दावे कर रहा है. कश्मीर में मौजूदा हालात के बारे में छप रही इन रिपोर्ट के लिए हमें थोड़ा पीछे जाने की भी जरूरत है. याद कीजिए वो वक्त जब एक मुठभेड़ में बुरहान वानी को मारा गया था. उसके बाद कश्मीर के हालात कैसे थे. रोज पत्थरबाजी होती थी. पुलिस को पैलेट गन चलानी पड़ती थीं और हालात खराब थे. ये साफ है कि कश्मीर हमारा है और जब कश्मीर हमारा है तो वहां के लोग भी हमारे हैं. ऐसे में कोई भी सरकार नहीं चाहती कि वो अपने नागरिकों पर ही गोलीबारी करे.

जम्मू कश्मीर से जब अनुच्छेद 370 को हटाया गया तो इन नागरिकों की सुऱक्षा की चिंता करना सरकार की प्राथमिकता थी. अगर पड़ोसी देश के बहकावे में आकर कुछ लोग इकठ्ठे हो जाते और हिंसक प्रदर्शन करते तो हमारी ही जनहानि होती. समय के साथ लोगों को समझाया जाएगा, वक्त गुजरेगा तो लोगों को सोचने का तरीका भी बदलेगा. अभी के दौर में कश्मीर में लगे प्रतिबंध वहां के लोगों की सुरक्षा के लिए ही हैं लेकिन आप विदेशी मीडिया का रवैया देखिए. वहां ऐसी तस्वीर पेश की जा रही है जैसे दुनिया का सारा जुल्म कश्मीर पर ही हो रहा है. वॉल स्ट्रीट जर्नल नाम के अखबार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि सरकार ने कश्मीर के अस्पतालों को कब्रगाह बना दिया है. वहां दवाईयां पूरी नहीं हैं जबकि इस तरह की कोई रिपोर्ट भारत में मेनस्ट्रीम मीडिया से अलग रिपोर्टिंग करने वाले लोगों तक ने नहीं लिखी है. जम्मू कश्मीर पुलिस के अधिकारी इफ्तिखार हुसैन ने वॉल स्ट्रीट की इस रिपोर्ट का खंडन किया है और इसे प्रोपगेंडा बताया है. जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक वहां के अस्पतालों का दौरा करते रहे हैं. बीबीसी ने कई बार हिंसा और तमाम तरह की खबरें कश्मीर के लिए लिखी हैं.

बीबीसी और विदेशी मीडिया की रिपोर्टिंग का जब जिक्र हो तब पाकिस्तान के बालाकोट में हुई एयर स्ट्राइक याद आती है. पूरी विदेशी मीडिया ये साबित करने में जुटी थी कि बालाकोट में भारतीय वायुसेना का हमला बेकार था और इसमें कोई आतंकी मारा नहीं गया. भारत में भी तमाम लोग इसी विदेशी मीडिया का हवाला देकर वायुसेना की बहादुरी और काबिलियत पर सवाल उठा रहे थे. आज पाकिस्तानी पीएम इमरान खान दुनियाभर को खुद चीखकर बताने में लगे हुए हैं कि भारत बालाकोट से भी बड़ा एक्शन ले सकता है. अगर बालाकोट में कुछ हुआ ही नहीं था तो इमरान किस बड़े एक्शन की बात कर रहे हैं. विदेशी मीडिया को भी अब जवाब देना चाहिए. ऐसे में विदेशी मीडिया की भारत विरोधी रिपोर्टिंग एक एजेंडा है जिसका मकसद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को कमजोर और खराब करना है.

बेशक कश्मीर में लोगों को दिक्कतें होगीं क्योंकि प्रतिबंध कड़े हैं लेकिन इनको जिस तरह से पेश किया जा रहा है, वो कुछ ऐसा है कि सरकार कश्मीरियों पर जुल्म के लिए एकदम तैयार बैठी है और भारत कश्मीरियों का दुश्मन है. ये लोग ये नहीं समझते कि कश्मीर ही नहीं देश के तमाम हिस्सों में कुछ भी संवेदनशील होने पर धारा 144 लगाई जाती है. कर्फ्यू लगाया जाता है लोगों को दिक्कतें तब भी होती हैं लेकिन ये कदम लोगों की सुरक्षा के लिए ही उठाए जाते हैं. कुछ तानाशाहों को छोड़ दें तो कोई भी सरकार नहीं चाहती कि वो अपने ही नागरिकों को दिक्कतों में डाले. ऐसे में विदेशी मीडिया को अपनी करतूतों से बाजा आना चाहिए.