देखिये वो जो टिपिकल आदम जमाने वाला जाति आधारित वोटिंग परसेंटेज निकालने का फॉर्मूला है ना.. उसका किला दरक चुका है. और यही बात राजनीतिक विश्लेषक या तो समझ नहीं रहे या समझना चाह नहीं रहे. नई पीढ़ी को इस चीज से मतलब नहीं कि उसकी जाति का नेता कौन है, उसे इस बात से मतलब है कि उसका भविष्य का भारत कैसा होनेवाला है. बस इत्ती सी बात हर उस ग्राउंड रिपोर्टर को पता है जिसने वाकई ग्राउंड पर मेहनत की है. ये स्टूडियो में बैठ कर 2+2 निकालने वाला फॉर्मूला अब उतना प्रभावी नहीं रहा. लेकिन हमारे स्वयंभू विश्लेषक अभी भी वही अटके पड़े हैं.

अगर चुनावी नतीजे एग्जिट पोल्स के अनुरूप ही रहते हैं तो एक बात बिल्कुल साफ है. वो ये कि चुनाव मोदी के नाम पर रेफरेंडम था, जिसमें देश की जनता ने उन्हें डिस्टिंक्शन मार्क से पास किया है.

जब हर सीट पर मुद्दा मोदी हो, हर सीट का उम्मीदवार मोदी हो, हर सीट का समीकरण मोदी बनाम ऑल हो तो बनाते रहिए आप एम वाई समीकरण या डी एम वाई समीकरण सबका हश्र वही होगा जो एग्जिट पोल्स दिखा रहे हैं. क्योंकि ये चुनाव कभी जातिगत समीकरणों का था ही नहीं. ये नई पीढ़ी के मतदाताओं की आशा-आकांक्षाओं का चुनाव था. बियॉन्ड जाति जाकर मतदाताओं ने मोदी विरोधियों को जो आईना दिखाया है उससे इस बात की संभावना बढ़ गई है कि जैसे इस चुनाव में मुसलमान वोट कोई मुद्दा नहीं था, वैसे ही अगले चुनाव में जाति कोई मुद्दा नहीं रहेगी.

एक और बात जो एग्जिट पोल्स हाइलाइट कर रहा है वो ये कि देश का युवा देश की सुरक्षा को सर्वोपरी मानता है. आप स्टूडियो में बैठ कर, एसी कमरों में बैठ कर, अंग्रेजी में ब्लॉग लिखकर ऐसे लोगों को मूर्ख ठहरा सकते हैं लेकिन गांव-देहात में जो युवा वर्ग अपने भविष्य के सपने देख रहा है उसके लिए इस देश की सुरक्षा नम्बर एक प्राथमिकता है. और बीजेपी नौजवानों को ये समझाने में कामयाब रही है कि देश को बेहतर सुरक्षा सिर्फ वही दे सकती है.

एक और बात जो विश्लेषकों के गले नहीं उतर रही वो है बेगूसराय से कन्हैया कुमार का हारना. टीवी मीडिया ने जिस तरीके से कन्हैया कुमार को कवर किया ऐसा लगा कि जैसे सारे उम्मीदवार कन्हैया से लड़ रहे हैं. उस समय जैसे लुटियन गैंग को डूबते को तिनके का सहारा मिल गया था. मैं तब भी इसको लेकर आश्वस्त था और अब भी हूं कि बेगूसराय में लड़ाई उम्मीदवारों की थी ही नहीं, वहां लड़ाई मार्जिन की थी कि गिरिराज सिंह कितने मार्जिन से जीत दर्ज करते हैं. एक और बात जो लेफ्ट थिंकर्स को समझनी होगी कि आरा से एक पल को राजू यादव जीत भी जाएं लेकिन बेगूसराय से कन्हैया कुमार का जीतना तकरीबन नामुमकिन है.