बीते दिनों नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत का एक बयान बेहद चर्चा में रहा. अमिताभ कांत ने कहा कि भारत में कुछ ज्य़ादा ही लोकतंत्र है, इसीलिए यहां कड़े आर्थिक सुधार लागू करना मुश्किल है. अमिताभ कांत दरअसल नए कृषि कानूनों और इसके बाद होने वाले किसान आंदोलन के बारे में बात कर रहे थे. अमिताभ के इस बयान के बाद, उनकी खासी आलोचना हुई और वो सोशल मीडिया पर ट्रोल होने लगे. अमिताभ कांत का बयान, किसान आंदोलन के संदर्भ में थे, इसलिए इसकी आलोचना हो रही है लेकिन असलियत में कांत को भारतीय लोकतंत्र की हर एक व्यवस्था के बारे में अपनी राय रखनी चाहिए थी कि क्या आंदोलनों के अलावा भी 'टू मच डेमोक्रेसी' का फायदा 'लोग' उठाते हैं?

कांत के टू मच डेमोक्रेसी के बयान को भारतीय राजनीति के संदर्भ में ही रखकर देखते हैं. भारत के इस महान लोकतंत्र में आज एक आम आदमी के राजनेता बनकर चुनाव जीतने की हालत क्या है? दूसरी तरफ अपराधियों, बाहुबलियों और धनबलियों के चुनाव जीतने का हालत क्या है? किसी भी चुनाव की हालत देख लीजिए, अपराधियों के लिए विधानसभा और संसद की राह बेहद आसान रहती है. बीते दिनों सजायाफ्ता लोगों के चुनाव लड़ने पर लगी रोक के बाद थोड़ा परिवर्तन ज़रूर हुआ लेकिन आज राजनीति में ऐसे लोगों का दखल कम नहीं हुआ. लालू यादव आज भी एक घोटाले की सजा रांची के एक अस्पताल में काट रहे हैं, वहां से वो विपक्षी विधायकों को दलबदल के लिए उकसाते हैं. उनके दाहिने हाथ शहाबुद्दीन, आज भले ही तिहाड़ जेल में हों लेकिन जब पिछली बार जमानत मिली तो एक शख्स की हत्या करवा चुके हैं. बिहार की राजनीति में उनका दखल आज भी कम नहीं हुआ है. यूपी में भी बाहुबलियों की भरमार है. समाजवादी पार्टी के बाद इनमें से तमाम अब बीजेपी के साथ हैं, वो अलग बात है कि ये लोग अपने रूतबे में नहीं हैं लेकिन आजाद हैं. राजा भइया को ही ले लीजिए, आजकल बीजेपी के कृपांक बने हुए हैं. भारतीय लोकतंत्र की यह हालत 'टू मच डेमोक्रेसी' के अंदर ही आती है क्योंकि अगर कोई भारतीय राजनीति के धनबली और बाहुबलीकरण पर सवाल खड़ा करेगा और कोई कानून लाने की बात करेगा तो तमाम संवैधानिक तथ्यों के जरिए ही उसकी बात को काटा जाएगा.

अब अमिताभ कांत के खुद के ही एक बयान पर आते हैं. 2015 में बीफ़ को लेकर कई लोगों की मॉब लिंचिंग में हत्या हो गई. सियासत भी गर्माई और तमाम सवाल खड़े हुए. ऐसे में एनडीटीवी के एक कार्यक्रम अमिताभ कांत जाते हैं, उनसे बरखा दत्त सवाल पूछती हैं कि जिस तरह से बीफ को लेकर लोगों की हत्या हो रही है उसके बारे में आपका क्या कहना है? अमिताभ कांत ने कहा, "देश में सभी को अपनी पसंद का खाने का हक है", बरखा दत्त ने फिर पूछा, "इसमें बीफ भी शामिल है?, अमिताभ कांत ने कहा, "हां". अमिताभ कांत ने तब जो कहा वो भी दरअसल टू मच डेमोक्रेसी ही था क्योंकि एक समुदाय जिसे मां के तौर पर पूजता है आखिर उसके मांस को खाने को लेकर आप ऐसा कैसे कह सकते हैं.

खैर अमिताभ कांत का ताजा बयान अगर देखें तो भारत के इतिहास से लेकर अभी तक में तमाम उदाहरण उनके बयान के समर्थन में मिल जाएंगे लेकिन ये दरअसल टू मच डेमोक्रेसी नहीं, टू मच डर्टी पॉलिटिक्स के उदाहरण हैं. हमें लंबी लड़ाई के बाद आजादी मिली और फिर एक उदारवादी लोकतंत्र, लेकिन उस लोकतंत्र के उदारवादी स्वभाव का फायदा यहां सभी ने जमकर उठाया है. नेताओं ने जमकर लूट मचाई और लोकतंत्र की बात करते रहे. जनता को यह समझाया गया कि वोट डालना ही उसका एक मात्र लोकतांत्रिक काम है. बाकी 5 साल आप सोते रहिए. ऐसी हालत में, जब कहीं से कोई विरोध की आवाज़ आती है तो लगता है लोकतंत्र कुछ ज्यादा ही हो गया है. अमिताभ कांत अभी तो नहीं बोल पाएंगे, लेकिन रिटायर होने के बाद कम से कम उन्हें एक किताब लिखनी चाहिए और अपने बयान के संदर्भ का विस्तार करना चाहिए. यकीनन वो एक शानदार किताब होगी जिसमें 'टू मच डेमोक्रेसी' की अच्छी तरह से व्याख्या करनी चाहिए. इस बार वो ट्रोल नहीं किए जाएंगें, बल्कि उनकी तारीफ़ होगी.