अमेरिका की मशहूर पत्रिका टाइम्स ने अपने कवर पेज पर एक स्टोरी की है. आतिश तासीर नाम के विदेशी मूल के एक पत्रकार की लिखी गई इस कवर स्टोरी में पीएम मोदी को डिवाइडर इन चीफ बताया गया है. पीएम मोदी को दी गई इस संज्ञा का हिंदी में मतलब भारत को बांटने वाला है. लेख लिखने वाले पत्रकार का सवाल है क्या भारत पीएम मोदी को पांच साल और सह पाएगा या कह सकते हैं झेल पाएगा ?

अपने लेख में पत्रकार ने लिखा है कि भारत में पीएम मोदी के वक्त में अल्पसंख्यकों और दलितों पर हमले हुए. चुनाव के वक्त में विरोधी पीएम मोदी पर हमले के लिए इसे इस्तेमाल कर सकते हैं. पीएम के विरोधी भी उन पर आरोप भारत को बांटने का लगाते हैं. भारत की सियासत में एक हल्कापन आ चुका है. यहां आरोपों की कोई बुनियाद नहीं होती. कोई भी पार्टी किसी पर भी कुछ भी आरोप लगा देती है. एक नहीं सभी पार्टियों की हालत यही है, लेकिन इस बीच टाइम्स पत्रिका क्या कहना चाहती है और उसके आरोप के बारे में एक विश्लेषण करना चाहिए. क्या वाकई पीएम मोदी के शासन के पांच साल में भारत बंट गया है ?

अगर हम पीएम मोदी के कार्यकाल को देखें तो इस दौरान देश के कई राज्यों में मॉब लिंचिंग हुई. ये धार्मिक थीं. गौरक्षकों पर कई जगह पिटाई के आरोप लगे. गुजरता के ऊना में भी दलितों की पिटाई हुई. इस दौरान तमाम सरकारी योजनाएं भी शुरू हुईं. तीन तलाक को असंवैधानिक ठहराया गया. सरकार इसके खिलाफ अध्यादेश लाई. हालांकि तीन तलाक बिल अभी भी पास नहीं हो पाया.

ऊपर दिए गए तथ्यों की अलग अलग विवेचना करते हैं. कथित गौरक्षकों के उत्पात, मॉब लिंचिंग और ऊना में दलितों की पिटाई के मुद्दे पर सरकार घिरी. ये ऐसा मुद्दा था जो न केवल छवि बल्कि चुनावी राजनीति में भी बीजेपी को नुकसान पहुंचाने वाला था. पीएम मोदी ने खुले मंच से इनकी आलोचना की. गौरक्षकों को गुंडा बताया और राज्यों को इनके खिलाफ एक्शन लेने को कहा. कहा जाता है कि वीएचपी और संघ इसे लेकर पीएम से नाराज भी हुए. दूसरी तरफ ऊना में दलितों की पिटाई के बाद भी पीएम ने भावुक होते हुए लोगों से दलितों पर अत्याचार न करने की अपील की थी. एक पीएम का ऐसे संदेश देना मायने रखता है. हालांकि झारखंड में 2017 में हुई मॉब लिंचिंग में अलीमुद्दीन की हत्या हुई. इसमें 11 लोगों को दोषी ठहराया गया. उन्हें सजा भी मिली लेकिन बाद में हाईकोर्ट से उन्हें जमानत मिल गई. मोदी सरकार के मंत्री जयंत सिन्हा ने दोषियों का माला पहनाकर स्वागत किया. तमाम दबाव के बावजूद जयंत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. ऐसे में पीएम की कथनी और करनी पर सवाल भी उठे. हालांकि ये भी एक तथ्य है कि एक वक्त के साथ म़ॉब लिंचिंग की घटनाएं रूकीं भीं. भीड़ की हिंसा भारत में पहले भी होती रही है और वक्त के साथ इसके कारण बदलते रहे हैं. जब सुप्रीम कोर्ट ने दलित एक्ट में बदलाव किया तो सरकार ने इसे भी पलटा. इससे भी सरकार को नुकसान हुआ. उसका सवर्ण वोटर नाराज हुआ और कहा जाता है कि एमपी का चुनाव बीजेपी इसी वजह से हारी.

टाइम्स ने अपनी पत्रिका में एक लेख लिखा है. इसमें पीएम की उज्जवला और जनधन जैसी योजनाओं की तारीफ की गई है. उन्हें रिफॉर्मर यानि सुधारक और भारत की उम्मीद बताया गया है. खास बात ये है कि मोदी पर भारत को बांटने का आरोप लगाने वाले भी बीते पांच साल में एक भी ऐसी खबर नहीं सुना पाए जिसमें योजनाओं में किसी भी प्रकार का भेदभाव किया गया हो. योजनाओं से लाभ-नुकसान जो कुछ भी हुआ वो सभी को हुआ उसका मजहब और जाति से ताल्लुक नहीं रहा. एक शासक के तौर पर अपनी योजनाओं को बगैर भेदभाव के जनता के बीच पहुंचाने का काम बीजेपी सरकार ने किया. यूपी में मदरसों के आधुनिकीकरण की भी बात हुई हालांकि ये जमीन पर कितना होता है ये देखने वाली बात होगी.तीन तलाक को लेकर तमाम आलोचनाओं के बावजूद सरकार ने इसे लेकर रूख साफ रखा. मुस्लिम महिलाओं को शोषण से बचाने की दिशा में ये अहम कदम था. ये कदम उनके सशक्तिकरण के लिए उचित कदम था. उम्मीद है कि बेहतर कानून के साथ आने पर मुस्लिम महिलाओं को इसका लाभ मिल सकेगा.

हमने उन तीन बड़े तथ्यों के बारे में बात की है जो बतातें हैं कि मोदी सरकार की आर्थिक और रोजगार के मोर्चे पर भले ही चुनौतियां रहीं हों लेकिन पीएम मोदी के लिए डिवाइडर इन चीफ जैसी संज्ञाओं का प्रयोग एक अतिवाद का उदाहरण है. भारत का धर्म के आधार पर बंटवारा 1947 में हो गया था. तब से लेकर आज तक देश में हिंदू मुस्लिम के बीच खाई है. समय समय पर होने वाले दंगे इसी ओर इशारा करते रहे हैं. धार्मिक नफरत भारत में नई नहीं है. ये हमारे खून में आ चुकी है. भले ही हम गंगा जमुनी तहजीब की बात करें लेकिन जब दंगों में होने वाली निर्दोषों की मौतों को देखते हैं तो ये सब बुद्धिजीवियों की बकवास मालूम पड़ती है. टाइम्स के इस पत्रकार को मोदी के अंदर देश को बांटने वाली छवि कहां से नजर आई से सोचने वाली बात है. शायद एक विदेशी मूल के लेखक से यही उम्मीद भी की जा सकती है.