कल भारत के संविधान निर्माता माने जाने भीमराव आंबेडकर की जयंती थी.उनका जन्म 14 अप्रैल 1891 को एमपी के एक छोटे से गांव में हुआ था.भीमराव आंबेडकर के पिता का नामा रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था.वो अपने माता पिता की चौदहंवी संतान थे.आंबेडकर का जन्म सामाजिक रूप से छूत मानी जाने वाली महार जाति में हुआ था.ऐसे में बचपन से ही उन्होंने सामाजिक अस्पृश्यता को देखा था.

आंबेडकर के बारे में तमाम तरह की बातें कल लिखी गईं.उनकी तारीफ में तमाम लेख लिखे गए.ऐसे में हमने सोचा कि एक आलोचनात्मक लेख आंबेडकर के बारे में लिखा जाए.आरक्षण को लेकर जिस तरह का उनका रूख था उसके बारे में लिखा जाए और अंग्रेजों के गुलाम भारत से लेकर आज के आजाद भारत तक पर उसके असर के बारे में लिखा जाए.दरअसल अंग्रेजों की पकड़ जब भारत पर कमजोर पड़ने लगी तो उन्होंने बांटों और राज्य करो की नीति अपनाई.अंग्रेजों की इसी नीति के चलते भारत के दो टुकड़े भी हुए.

महात्मा गांधी अपने सत्याग्रह और आंदोलनों के चलते अंग्रेजों की आंख में चुभ रहे थे.अंहिसा के जरिए अपनी बात रखने वाले गांधी के खिलाफ अंग्रेजों की कोई नीति काम नहीं कर रही थी.1920 से 1922 के बीच गांधी जी के असहयोग आंदोलन ने अंग्रेजों की चूले हिला दीं.हालांकि चौरी चौरा कांड के बाद इस आंदोलन को स्थगित करना पड़ा.1927 में अंग्रेजों ने भारत में कथित संवैधानिक सुधारों के नाम पर एक आयोग भेजा,जिसे साइमन कमीशन कहा जाता है.इस कमीशन में भीमराव आंबेडकर अकेले भारतीय थे.साइमन कमीशन के सामने आंबेडकर ने मांग रखी कि दलितों को भारत में मुस्लिमों की तरह एक अलग वर्ग की तरह देखा जाना चाहिए.इस कमीशन का खासा विरोध हुआ.कांग्रेस-मुस्लिम लीग दोनों ने इसका विरोध किया.इसी कमीशन का विरोध करते हुए लाला लाजपत राय की जान भी चली गई.

इसी साइमन कमीशन के प्रस्तावों पर विचार के लिए अंग्रेजों ने 1930 में प्रथम गोलमेज सम्मेलन बुलाया.इसकी अध्यक्षता ब्रिटिश पीएम रैम्जे मैकडोनाल्ड कर रहा था.दरअसल गोलमेज सम्मेलन भारत के संवैधानिक ढांचे के विकास के लिए नहीं बल्कि भारत को सामाजिक रूप से तोड़ने के लिए की गई अंग्रेजों की एक साजिश थी.जिस वक्त भारत की आजादी सिर्फ एक मुद्दा होना चाहिए थी,उस वक्त में अंग्रेजों ने भारत से हिंदू महासभा को भी बुलाया,मुस्लिम लीग को भी बुलाया और दलित वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर आंबेडकर को भी बुलाया.गौर से देखा जाए तो अंग्रेजों ने भारत को तोड़ने की एक संरचनात्मक योजना बनाई थी.पहली योजना के तहत देश को धर्म के आधार बांटना था तो दूसरा जाति के आधार पर.

इस सम्मेलन में आंबेडकर ने जोरदार भाषण दिया.ब्रिटिश पीएम ने खुद इसकी सराहना की और ब्रिटिश मीडिया ने भी इसको खासा महत्व दिया.दरअसल गांधी जी परेशान अंग्रेजों को भारत के अंदर ही कोई दिख चुका था जो उनकी खिलाफत करता.वो एक वर्ग विशेष से भी था ,जिसकी वजह से उसके पास जनसमर्थन भी हो सकता था.उधर प्रथम गोलमेज सम्मेलन में मुस्लिमों ने अलग प्रतिनिधित्व की मांग भी उठा दी.ऐसे में कहने को तो पहला गोलमेज सम्मेलन असफल हुआ लेकिन अंग्रेज अपने असल एंजेडे में पास हो चुके थे.

17 सितंबर 1931 को अंग्रेजों ने दूसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया.गांधी जी ने सम्मेलन में अंग्रेजों की चाल को असफल करने के लिए मुस्लिमों की सभी मांगों को मानने का मन बनाया.उन्होंने हिंदू महासभा की चेतावनी को भी नजरअंदाज किया.गोलमेज सम्मेलन में उन्होंने ये काम किया भी लेकिन यहीं आंबेडकर ने यहां मुसलमानों की तरह दलितों के लिए सरकार और विधानमंडल में अलग प्रतिनिधित्व की मांग कर दी.गांधी और अंबेडकर में यहां झड़प भी हुई.गांधी जी इससे नाराज हुए उन्होंने कहा, "यदि अस्पृश्यों को हिंदू जाति से अलग किया गया तो मैं उस चेष्टा का अपने प्राणों की बाजी लगाकर विरोध करूंगा."इस सम्मेलन में जब गांधी जी कांग्रेस को अछूतों का प्रतिनिधि बताया तो आंबेडकर ने वहीं उसका पुरजोर विरोध किया.उन्होंने गांधी जी के दावे को झूठा बताया.इसके बाद ब्रिटिश पीएम रैम्जे मैक्डोनाल्ड ने आंबेडकर को उनकी पैरवी के लिए शुक्रिया कहा.ब्रिटेन के तत्कालीन राजा जॉर्ज पंचम ने भी आंबेडकर की तारीफ की.इस सम्मेलन में दुनिया ने एक कमजोर गांधी को देखा.जिसको मुस्लिमों और दलितों दोनों ने अपनी मांगों के लिए किनारे कर दिया था.कमजोर गांधी अंग्रेजों के लिए एक जीत थी.

अगस्त 1932 को ब्रिटिश पीएम रैम्जे मैक्डोनाल्ड ने सांप्रदायिक निर्णय का एलान कर दिया.सांप्रदायिक निर्णय के तहत दलित वर्गों और अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र और सीटें आरक्षित की गईं.आधुनिक भारत के इतिहास में पूर्व IPS विजय अहीर ने इसे अंग्रेजों की फूट डालो और राज्य करो की नीति का परिणाम बताया है.सांप्रदायिक निर्णय के तहत दलितों को हिंदुओं से पृथक एक अलग धर्म के तौर पर मान्यता दी जानी थी.गांधी जी ने इस निर्णय का विरोध किया.उन्होंने सांप्रदायिक निर्णय को राष्ट्रीय एकता और भारतीय राष्ट्रवाद पर प्रहार के तौर पर देखा.

इसके बाद गांधी जी ने पुणे की यरवदा जेल में भूख हड़ताल कर दी.अंग्रेजों की इन्हीं अलगाववादी नीतियों के विरोध में ये हड़ताल थी.इसके बाद गांधी और आंबेडकर के बीच पूना पैक्ट हुआ.पूना पैक्ट में ही ये तय हुआ कि व्यवस्थापिका सभा में दलितों के अधिकार हिंदुओं के अंतर्गत ही सुरक्षित रखे जाएंगे.इसके तहत दलितों के लिए अलग निर्वाचन मंडल की मांग को ठुकरा दिया गया लेकिन प्रांतीय विधानमंडलों में अछूतों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या को बढ़ा दिया गया.आधुनिक भारत के इतिहास में विजय अहीर लिखते हैं कि ये समझौता दरअसल भारत के सवर्ण हिंदुओं और दलितों के बीच था.विजय अहीर में लिखते हैं कि पूना पैक्ट के बाद भी हिंदू समाज में दलितों को लेकर विसंगतिया कायम रहीं और इससे पूरे दलित समाज को फायदा न होकर सिर्फ उन्हें फायदा मिला जो पहले से ही संपन्न थे और सत्ता के करीब रहते थे.

इसके बाद तीसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस ने भाग नहीं लिया.इसमें भारत के संवैधानिक प्रश्नों का हल ढूंढ़ने का नाटक किया गया.तीसरे गोलमेज सम्मलेन की समाप्ति के बाद एक श्वेत पत्र जारी किया गया जिस पर विचार करने के लिए लॉर्ड लिनलिथगो की अध्यक्षता में ब्रिटिश संसद द्वारा एक संयुक्त समिति गठित की गई. इसी समिति की रिपोर्ट के आधार पर “भारत सरकार अधिनियम, 1935” का निर्माण हुआ.

इसके बाद भी जहां गांधी एक तरफ दलितों की सेवा करके,उनके साथ भोजन करके भेदभाव को खत्म करना चाहते थे वहीं आंबेडकर आरक्षण के रास्ता अपनाना चाहते थे.दरअसल गांधी जानते थे कि आरक्षण जैसा प्रणाली देश में विभाजन का ही एक रूप बढ़ेगा इसलिए वो एक वैचारिक तौर पर उसे खत्म करना चाहते थे.उन्होंने दलितों को हरिजन यानि भगवान की संतान कहा.दरअसल गांधी का रास्ता कठिन था.ये सच है कि जो समाज में दलितों की हालत थी उसे सुधारने में गांधी के बताए रास्ते से लंबा वक्त लगने वाला था पर शायद वो टिकाऊ ज्यादा था.दूसरी तरफ आंबेडकर के बताए रास्ते से दलितों की हालत तो सुधरी पर वो टकराव पर समाज टकराव की राह पर आकर खड़ा हो गया.

भीमराव आंबेडकर को देखकर महाभारत के कर्ण की याद आती है.जो प्रतिभावान और सज्जन होते हुए भी दुर्योधन के जाल में फंस गया था.ये सच है कि शायद अगर कर्ण दुर्य़ोधन के पक्ष में नहीं जाते तो शायद महाभारत की लड़ाई ही न होती.उसी तरह आंबेडकर को भी देखकर लगता है कि अंग्रेज भारत का एक बंटवारा भले ही धर्म के नाम पर करने में सफल रहे हों पर जाति के आधार पर तोड़ने के लिए उन्होंने जानबूझकर गांधी के खिलाफ आंबेडकर को खड़ा किया और काफी हद तक अपने मकसद में कामयाब भी रहे.

इन सबके बीच जो अहम सामने आती है वो ये है कि ये पूरी राजनीति भारत की ही पुरानी सामाजिक बुराई का परिणाम थी.भारत बंटा हुआ तब भी था बस तब एक समाज ने दूसरे को दबाकर रखा था.गांधी जहां दोनों को प्रेम के जरिए बराबरी पर लाना चाहते थे वहीं दूसरी ओर आंबेडकर के रास्ते से दोनों समाज बराबरी पर तो आए लेकिन बीच में उनके एक खाई खड़ी हो गई.अंग्रेज भी शायद यही ख्वाब देखकर भारत को छोड़कर गए होंगे.