कोरोना का संकट भारत में पहले से कहीं ज्यादा गंभीर हो चुका है. कोरोना के हर दिन आने वाले केस और इससे होने वाली मौतों की लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन समूचे भारत का रवैया इस वक्त क्या है ? समूचे भारत का मतलब यहां पर कोई एक सरकार नहीं बल्कि सरकार, मीडिया, और जनता सभी हैं. भारत में कोरोना के आने के बाद पीएम का 21 दिनों के लॉकडाउन का ऐलान के वक्त, समूचे भारत की मनोदशा क्या थी और अब क्या है ? कितना बदलाव तब से लेकर अब तक आ चुका है और क्या भारत वाकई कोरोना के साथ जीना सीख रहा है ? इन तमाम सवालों के जवाब इस लेख में हम ढूंढने की कोशिश करेंगे.

लद्दाख: भारत को अगर चीन से पार पाना है तो समुद्र में अपनी ताकत बढ़ानी पड़ेगी

सबसे पहले हम बात करते हैं सरकार के स्तर पर. पीएम मोदी ने 24 मार्च को राष्ट्र को संबोधित किया था. इस संबोधन में पीएम ने जान है तो जहान है जैसे बातें कहीं. लोगों से कहा कि 21 दिनों के लॉकडाउन के दौरान घर में ही रहें वर्ना हमारा देश 21 साल तक पीछे जा सकता है. पीएम के ऐलान के मुताबित पुलिस-प्रशासन भी सख्त रहा. बाहर निकलने पर लोगों पर कार्रवाई हुई. पीएम मोदी का भाषण अपने-आप में एक नजीर था कि सरकार कोरोना संकट को बहुत ही ज्यादा गंभीर है. उस वक्त कोरोना का संक्रमण देश में इतने बड़े स्तर पर फैला भी नहीं था, लेकिन वक्त आगे बढ़ा और सरकार की भूमिका भी आगे बढ़ती गई. आज के दौर में जब हालत बहुत ज्यादा बुरी है तो पीएम मोदी न तो किसी से घर पर रहने की अपील कर रहे हैं और न ही प्रशासन उतना एक्टिव रहा है. आम तौर पर देश में बाजार सामान्य रूप से खुल चुके हैं. हां बस खाने पीने की दुकानों पर भीड़ ज़रूर नहीं है और वो भी शायद इसलिए कि लोग खुद ही बाहर नहीं निकल रहे, वर्ना जिस तरह की लड़ाई का आवाहन पीएम मोदी ने किया था अब वो गायब है और सरकार का रवैया बिल्कुल भी नहीं दिखता कि वो अब वो पहले की तरह लोगों को सचेत करना चाहती है.

अब आते हैं एक और बड़े स्तंभ, मीडिया की ओर. लगभग तीन साल न्यूज चैनलों में काम करने के बाद मेरा अनुभव कहता है कि भारत में न्यूज चैनलों से राजनीति की खबरों को हटाना बड़ा मुश्किल है. देश में हर 2-3 महीनों में कहीं न कहीं चुनाव होता है और राजनीति टीवी के पर्दे से उतर नहीं पाती. जब कोरोना का संकट आया तो इसने टीवी पर राजनीति के एकाधिकार को समाप्त कर दिया. यहां तक कि एमपी में सत्ता का बदलाव भी कोरोना के दौर में हवा हो गया और कुछ दिन के लिए कोरोना ने टीवी को पूरी तरह से घेर लिया. लेकिन वक्त यहां भी आगे बढ़ा. राजनीति ने कोरोना में राजनीति को ढूंढ लिया और मीडिया भी देर सबेर अपने एजेंडे को ढूंढने में कामयाब रहा. शुरुआत हुई दिल्ली में निजामुद्दीन मरकज से और मौलाना साद के नाम पर मीडिया ने बड़े कायदे से कोरोना को साइडलाइन कर दिया. इसी बीच किम जोंग उन के मरने की खबरें आने लगीं और मीडिया उधर अपना और पब्लिक का ध्यान बंटाने में कामयाब रही. थोड़ा वक्त और गुजरा और लद्दाख बॉर्डर पर चीन ने अपनी चालबाजी शुरु कर दी. मीडिया को एक बहुत बड़ा मुद्दा मिल गया और कोरोना को भारत में टीवी पर अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मिल चुका है. चीन के साथ तनाव की खबरें की चिंताजनक हैं लेकिन टीवी पर इस बारे में कोई सही रिपोर्ट मिलना बहुत ही मुश्किल है. ऐसे में टीवी से भी कोरोना का खौफ धीरे धीरे खत्म होता जा रहा है.

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अब आते हैं, देश के सबसे अहम स्तंभ जनता पर. जनता ने भी सरकार और मीडिया की तरह शुरुआत में कोरोना को गंभीरता से लिया. जिन मजदूरों को दिक्कत थी, उन्हें छोड़ दें तो अधिकांश लोग घरों में बैठे थे. सिर्फ जरूरी सेवाएं देने वाले लोग निकल रहे थे. ये सब तब हो रहा था जब कोरोना भारत में शुरुआती चरण में था, लेकिन अब जब कोरोना बहुत ढंग से फैल चुका है तो दिल्ली जैसे शहरों में सरकार ने ही अपने दफ्तर खोल दिए तो बाकी जगह भी दुकाने खोलने की इजाजत मिल गई. अब बाजार खुले हैं तो लोग भी खूब निकल रहे हैं. लोगों को देखकर लगता है कि कोरोना का डर उनके दिमाग से बिल्कुल निकल चुका है. सैलून तक खुले हुए हैं और लोग उनमें जा भी रहे हैं.

क्रिकेट में अक्सर हम मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति की बात करते हैं. भारत के नेताओं के लिए इस समय ये बहाना बनाना बेहद आसान हो सकता है. वो कह सकते हैं कि भारत ने कोरोना पर मनोवैज्ञानिक जीत हासिल कर ली है और जल्द ही हम पूरी तरह से जीत हासिल कर लेंगे लेकिन अभी देश के जो हालात हैं, उनमें लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है और ऐसा लगता नहीं कि सरकार बिल्कुल भी पहले की तरह अपना रुख रखने वाली है. कुछ दिन पहले फेसबुक पर किसी ने लिखा था कि मोदी जी लॉकडाउन, कोरोना के साथ इस तरह आगे बढ़ रहे हैं.

पहला लॉकडाउन- जान है तो जहान है, दूसरा लॉकडाउन- जान भी जहान भी और तीसरे में- जान जानी है जाएगी एक दिन..ऐसी बातों से क्या घबराना. फिलहाल देश की सरकार, मीडिया, और जनता सभी 'जान जानी है जाएगी एक दिन..ऐसी बातों से क्या घबराना की नीति' पर चलते नजर आ रहे हैं. बस किसी के ये कहने की देरी है कि भारत ने कोरोना पर मनोवैज्ञानिक जंग जीत हासिल कर ली है.