कुछ ही महीने पहले की बात है, कोरोना ने दुनिया और भारत को घेर लिया. लॉकडाउन हो गया लोग घरों में बंद हो गए. देश की सड़कों पर तमाम मजदूर पैदल ही घर की ओर निकल पड़े. तमाम की मौत हुई. तमाम दुखद तस्वीरें हर रोज सामने आती रहीं. लोगों ने कहा, कोरोना के बाद दुनिया बदल जाएगी. तमाम तरह के सामाजिक और आर्थिक बदलाव देखने को मिलेंगे. लेकिन वक्त गुजरा, आर्थिक हालात खराब होते गए और सरकार ने दबाव में आकर लॉकडाउन खोलने का फैसला किया. फिलहाल लगभग आर्थिक गतिविधियां चालू हैं, बाजारें खुलीं हैं और जहां बंद भी हैं, वहां भी बस औपचारिकता निभाई जा रही है.

अब आते हैं, दुनिया के बदलने की बात पर, दुनिया का मतलब यहां भारत से ही है. उम्मीद थी कि इस कोरोना काल की वजह के भारत के हेल्थ सिस्टम की चर्चा होगी और उसमें बदलाव की एक रुपरेखा तैयार हो सकेगी. सरकार को इस चर्चा से बाहर रखते हैं, मुद्दा उठाना विपक्ष का काम है और मीडिया का काम है विपक्ष को जगह देना. विपक्ष मीडिया पर पक्षपाती होने का आरोप लगाता रहता है लेकिन वो खुद कभी नरेंद्र मोदी से ऊपर उठ नहीं पाता. न विपक्ष मोदी विरोध से ऊपर उठ पाता है और न नही मीडिया मोदी जी के आभामंडल से. चलिए सरकार को नकारा मान भी लें तो आखिर मुद्दे कौन उठाएगा. पूरे कोरोना काल में दिल्ली को छोड़कर कहीं के भी अस्पतालों की बदहाली मीडिया में सामने नहीं आई. न तो किसी ने मुद्दा उठाया, क्या वाकई हमारे देश का हेल्थ सिस्टम इतना ही मजबूत है? कोरोना के इस संकट के दौरान ही, भारत चीन के बीच तनाव हो गया. पाकिस्तान तो वैसे भी कभी सुधरने को तैयार नहीं रहता. ऐसे में सारी चर्चा उधर ही शिफ्ट हो गई है. हेल्थ सिस्टम कोरोना काल के दौरान भी जिस तरह से अनदेखी का शिकार हुआ है, उससे तो लगता नहीं कि कुछ बदलाव होने वाला है.

दूसरे मुद्दे, रोजगार पर आते हैं. लोगों का पलायन हुआ और तमाम लोग मारे गए. शहरों के संकरे कमरों में रहने वाले मजदूरों के लिए, उनके मालिक अपना दिल भी बड़ा नहीं कर सके. शायद वो संकट कुछ दिन का ही था. अगर फैक्ट्रियों और कंपनियों के मालिक अपने मजदूरों की मदद करते तो लोग भागने और मरने को मजबूर नहीं होते. सोशल मीडिया इन मजदूरों के दर्द से कराह उठा, हालांकि नेताओं पर इसका असर तब भी ज्यादा नहीं पड़ा था. यूपी में योगी सरकार ने जरूर लोगों को रोजगार देने की बात कही और वक्त के साथ, इस पर कैसे अमल होता है, ये देखने वाली बात होगी, लेकिन केंद्र सरकार और विपक्ष रोजगार के नए मॉडल को तैयार करने पर कोई बात नहीं कर रहे. वक्त था अब ऐसे रोजगार मॉडल का विकास किया जाए जिसमें पलायन की संभावना कम से कम हो. रोजगार को गांवों तक पहुंचाया जाए, न कि गांवों के लोगों को रोजगार तक आना पड़े. इस कठिन समय में देश के पास सिर्फ कृषि का ही सहारा था. जब सब कुछ बंद था, तब किसान ही खेतों में काम करके लोगों का पेट भरने का काम रहे थे. पीएम मोदी ने अपने भाषण में किसानों और मिडिल क्लास को शुक्रिया अदा कहा, लेकिन खेती में बदलाव या कुछ नई योजनाओं के बारे में कुछ नहीं कहा. कोरोना के इस संकट काल में भी किसानों ने एक रुपये किलो तक में प्याज बेचा है. हम कुछ नहीं कर सकते, लेकिन किसानों को कम से कम वाजिब रेट तो दिलवाएं. किसानों की दाम से जुड़ी ये समस्या बड़ी आम है, सत्ताधीशों को इसकी खबर भी रहती है लेकिन करता कोई कुछ नहीं है. कम से कम इस वक्त तो किसान की कीमत समझकर, उसका कर्ज उतारने की कोशिश करें. किसानों का ये मुद्दा भी हमेशा गायब रहता था और आज भी गायब है.

कोरोना के संकट को देखकर लगा था कि कुछ बदलाव होकर रहेगा. समाज और सरकार, स्वास्थ्य और रोजगार के बारे में कुछ सोचेगी. यहां सरकार तो छोड़िए विपक्ष भी जनता के मुद्दों से गायब है. विपक्ष चीन और विदेश नीति पर ही टिका पड़ा है. ठीक है, वो मुद्दा भी जरूरी है लेकिन आखिर और भी बहुत कुछ देश में चल रहा है, वो मुद्दा भी उठाया जाना चाहिए. कुल मिलाकर, कोरोना काल ने भारत को लेकर मेरी उस धारणा को और भी मजबूत किया है कि 'भारत कभी सुधरने नहीं वाला'.