एक झूठ की दुनिया तैयार हो चुकी है जिसमें बताया जाता है कि देश में लोकतंत्र की हत्या 1975 में हुई थी.लोग उसे याद करते हैं किसी को कोसते हैं आगे भी ऐसा हो सकता है खासतौर पर अभी की सरकार में ये संभावना जोर शोर से जताते हैं. अभी की सरकार वाले कांग्रेस को घेरने के लिए 1975 का इस्तेमाल करते हैं. इंदिरा गांधी को कोसते हैं और आगे बढ़ जाते हैं.लेकिन इस बहस में जरूरत है राजनीतिक लोगों और उनसे प्रेरित लोगों से इतर एक चिंतन की जो 1975 में जो हुआ वो हुआ लेकिन एक आम आदमी आज के भारत में लोकतंत्र की सीढ़ी में कहां पर खड़ा हुआ है.

अगर आज देश में लोकतंत्र पर बात होती है तो बहस वहीं मोदी सरकार से शुरू होती है और वहीं खत्म हो जाती है. दावा किया जाता है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए इस पर चिंतन जरूरी है. लेकिन आखिर क्यों ये चिंतन सरकारों तक ही सीमित होकर रह जाते हैं. ऐसा लगता है जैसे एक साजिश सी है कि लोगों को सरकार से इतर सोचने ही न दिया जाए वो बस बुद्धिजीवियों के चंगुल में आकर इसी सोच में फंसकर रह जाएं कि कांग्रेस के समय में बुद्धिजीवी कितना आजाद थे और आज वो कितना आजाद हैं.

1975 होता या न होता लेकिन जरूरत थी बहस की व्यवस्था पर,एक लोकतांत्रिक व्यवस्था पर. जिसका हिस्सा दिल्ली में बैठी सरकार से लेकर खेत में फावड़ा चलाने एक मजदूर भी है. लेकिन लोकतंत्र की मनोहर कहानियों में सिर्फ सत्ता की चर्चा होती है न कि उस आदमी की जो इन लोगों को सत्ता तक पहुंचाता है. हालांकि उसे ये अहसास दिलाने की पूरी कोशिश की जाती है कि ये सब कुछ आप ही के लिए तो हो रहा है.आप आज के भारत को देखिए खुद को देखिए कि भारत के इस कथित लोकतंत्र में आपकी भूमिका कितनी है.आप जिन्हें चुनकर भेजते हैं वो आपके प्रति कितने जवाबदेह हैं.

आप गांवों से शुरु कीजिए. आपका प्रतिनिधि प्रधान होता है. आप उसे चुनकर भेजते हैं लेकिन अधिकतर प्रधान बाहुबल ,धनबल की बदौलत जीतते हैं. लोगों को दारू दिखाकर वोट खरीदे जाते हैं और फिर प्रधानी मिलने पर पूरे कार्यकाल में खूब ऐश किया जाता है.हालत ये हो चुकी है कि भले आदमी राजनीति में आना ही नहीं चाहता.बेशक गलती जनता की भी है की वो अपना वोट क्यों बेचती है लेकिन वो जनता जो वोट बेचती है वही संपूर्ण तो नहीं आखिर एक सीधा साधा आदमी जिसके पास अब विकल्प ही नहीं बचा है एक स्वच्छ उम्मीदवार को वो कहां जाए और जो यह व्यवस्था बनती जा रही है आखिर उस पर देश में चिंतन कब होगा.

आप विधायकों- सांसदों पर आइए.पार्टी केंद्रित राजनीति के इस दौर में 3-4 पार्टियां हैं.कुछ विशेष राज्य आधारित पार्टियां भी हैं.सबके सब बड़े लोकतांत्रिक होने का ढ़ोंग करते हैं लेकिन टिकट उसी को मिलेगा जो जितना बड़ा बाहुबली होगा.ऐसे दौर में जनता के पास विकल्प ही नहीं होता की वो उन 3-4 के अलावा किसी को वोट करे. कहने को निर्दलीय भी हैं और नोटा का विकल्प भी,लेकिन बहुमत के इस दौर में सब कुछ अधूरा है. जो निर्दलीय जीतते भी हैं वो भी या तो सत्ताधारी दल के साथ के चले जाते हैं अन्य़था उनके क्षेत्र की छीछालेदर कर दी जाती है.

चुनाव के बाद माननीय आपको आपकी गली में दिख जाएं तो भी बड़ी बात है और आजकल तो हालात ये हैं कि कई बार प्रत्याशी खुद उन क्षेत्रों में वोट मांगने तक नहीं जाता जहां से उसे वोट मिलने की उम्मीद नहीं होती.ऐसे में जब ये लोग चुनाव जीतकर आते हैं तो इनका काम कमीशनखोरी करना और ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना होता है.जनता के काम क्या हैं, उनसे पूछने वाला कोई नहीं होता और वो बताएं तो सुनने वाला कोई नहीं होता.ऐसे में इस लोकंतंत्र में जनता का काम बस एक ही है वो है जब चुनाव हो तब अपने मन से जिसे वोट करना हो उसे वोट कर दो.बाकी सरकारी अस्पताल में इलाज हो न हो, सरकारी स्कूलों में अध्यापक बजाय पढ़ाने के मजें करें. स्कूलों में बच्चों को खाना मिले या न मिले.उनके ड्रेसों में घपले होतें रहें तो हों.

सरकार ने आधार कार्ड हर जगह जरूरी कर दिया.उनका कहना था कि पारदर्शिता के लिए किया है. कई जगह बच्चे खत्म हो गए भूंख से,परिवारों को राशन नहीं मिला लेकिन स्थानीय नेताओं के कानों पर जूं नहीं रेंगी.आखिर ये जो एक सिस्टम बनता जा रहा है जहां प्रधानमंत्री और एक दो सुपरमैन जैसे लोगों से उम्मीद की जाती है कि वो सब ठीक कर देंगे, अपने हितों के लिए ये नेता लोग भी ऐसे वादे स्वीकार भी कर लेतें हैं लेकिन कब तक आखिर झूठे लोकतंत्र पर हम गर्व करते रहेंगे.गांधी जी ने ग्राम स्वराज पर जोर दिया था. अगर भारत कभी विकसित होगा तो इन्हीं गांवों के विकास से उसकी नींव पड़ेगी लेकिन जब पंचायत घरों में जुएं की फड़े लगेंगी तो कैसा होगा विकास और कौन सुनेगा ग्रामीणों की बात.

आज सच्चाई ये है कि लोकतंत्र की नींव जर्जर हो चुकी है.ऊपर से ज्यादा नीचे के सिस्टम में खराबी है. ऊपर वाले तो फिर भी दिल्ली केंद्रित मीडिया के दबाव में कुछ कर भी जाएं लेकिन नीचे वाले पूरी तरह बेशर्म हो चुके हैं और ये बेशर्मी सिस्टम के DNA में आ चुकी है. नया से नया आदमी भी आते ही सीख जाता है कि उसे जनता का उपहास किस तरह उड़ाना है.जरूरत है अभी भी फर्जी की चर्चाओं से ऊपर उठकर वास्तविक सुधारों पर बात करने की हर 5 साल में सरकार बदलने की प्रार्थना करने के अलावा इस देश का कुछ नहीं हो सकता.