दिल्ली में हुई हिंसा को कई महीने बीत गए है. फरवरी महीने के आखिर में हुई सांप्रदायिक हिंसा में 53 लोग मारे गए थे और 200 से ज्यादा लोग घायल हुए थे. हिंसा करने और फैलाने के आरोप में 2200 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है. अभी हाल ही में जामिया मिलिया से पीएचडी कर रहे एक शख्स को जाफराबाद में हुई हिंसा में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

शुरुआत के दो दिनों में नकारा साबित हुए दिल्ली पुलिस ने बाद में दंगे को रोकने में सफलता भी हासिल की और कोरोना महामारी के दौर में भी लोगों की गिरफ्तारियां जारी है. वैसे आधिकारिक तौर पर दंगा 23 फरवरी को शुरू हुआ और 29 फ़रवरी को हिंसा पर पूरी तरह काबू पा लिया गया पर दंगे में हुआ नुकसान, लोगों को पूरे जीवन के लिए एक ऐसा घाव दे जाता है जो शायद ही कभी भर पाए. इस हिंसा ने तमाम लोगों की रोजी रोटी छीन ली. जो लोग हिंसा में मारे गए, उनके परिवारों को कभी ना भूलने वाला दर्द झेल रहे हैं.

कुछ परिवार ऐसे है जिन्होंने दंगे में न सिर्फ अपना सब कुछ गवां दिया बल्कि अब पुलिस ने उन्हें ही दंगे का आरोपी बना कर जेल में डाल दिया है. ऐसे परिवार शायद ही दंगे के खौफ से कभी आजाद हो पाएं. ऐसा ही एक परिवार है हरीओम मिश्रा का, उत्तरी घोंडा की किशन कुञ्ज गली में रहने वाले हरिओम मिश्रा, विजय पार्क के मोहन पुरी इलाके में "पंडित जी की रसोई" नाम से एक ढाबा चलाते थे. साथ ही इलाके में होने वाली शादी आदि समारोह में कैटरिंग का काम भी करते थे. 24 फ़रवरी को हुई हिंसा में दूसरे समुदाय के 25-30 लोगों ने इलाके की दुकानों पर हमला करके उन्हें लूटना शुरू कर दिया. पुलिस के आंसू गैस के प्रयोग के बाद भी उन लोगों ने पंडित जी की रसोई और उसके ठीक सामने एक मेडिकल स्टोर को लूट कर आग के हवाले कर दिया.

हरिओम मिश्रा की बेटी शालिनी का कहना है की "ढाबा ही एक मात्र रोजी रोटी का सहारा था जो की दंगे के भेट चढ़ गया. उसके बाद से परिवार आर्थिक संकट से जूझ है और पिता की गिरफ्तारी ने परिवार को आर्थिक और मानसिक दोनों तरफ से तोड़ कर रख दिया हैं"

शालिनी के अनुसार पुलिस ने न सिर्फ उनके पिता बल्कि 17 अन्य निर्दोष लोगों को गिरफ्तार किए है। और उन पर लगाए गए सभी आरोप गलत है।

कोरोना महामारी के चलते न्यायिक व्यवस्था और भी सुस्त हो गयी है. हरिओम मिश्रा के परिवार वालों का आरोप है की गिरफ्तारी के लगभग 2 महीने बीत जाने के बाद भी पुलिस ने मामले में चार्जशीट दाखिल नहीं की है और बीती 9 अप्रैल से ही हरिओम मिश्रा बिना किसी जुर्म के मंडोली जेल में बंद है. महामारी के चलते इन परिवारों को सुनने वाला कोई नहीं है और ये न्याय की आस में दर दर की ठोकरे खाने को मजबूर है. आर्थिक नुकसान के साथ साथ दंगाई होने का टैग भी इन्हें परेशान कर रहा है.