अलीगढ़ में ढाई साल की बच्ची के साथ दरिंदगी की सीमा पार कर दी गई. स्वाभाविक है कि इसको लेकर लोगों में गुस्सा है लेकिन सवाल उठता है कि इस घटना के बाद लोगों ने समुदाय विशेष के खिलाफ मोर्चा क्यों खोल दिया है? उन्हें नफरत और हिकारत भरी नजरों से क्यों देखा जाने लगा है? और उससे भी बड़ा सवाल कि हर घटना के बाद लोग उसे धार्मिक रंग क्यों देने लगे हैं?

वेल! इसकी शुरुआत करने का श्रेय जाता है 'आदर्श लिबरल्स' और मोमबती ब्रिगेड को. 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद इन्होंने अपनी कुंठा शांत करने के लिए एक ऐसी चिंगारी से खेलना शुरू किया जो आग बनकर देश के प्रेम और सौहार्द को जला कर खाक कर सकती थी. और उसी चिंगारी को नाम दिया गया 'असहिष्णुता'. और फिर उस असहिष्णुता के आडंबर के पीछे बड़े-बड़े कारनामे किये गए.

अलवर, रेवाड़ी, दादरी, हजारीबाग, महाराष्ट्र की घटनाओं को चुन-चुन कर धार्मिक रंग दिया गया. व्यक्तिगत दुश्मनी के चलते हुए झड़प के लिए भी बहुसंख्यक हिंदुओं को टारगेट किया गया. हर छोटी-बड़ी घटना का हवाला देकर असहिष्णुता का रोना रोया गया, कैंडल मार्च निकाला गया, अवार्ड वापसी की गई और मोदी के खिलाफ परसेप्शन बिल्ड करने के चक्कर में एक बड़े समुदाय को 'धार्मिक उन्मादी' होने का सर्टिफिकेट दे दिया गया.

इससे हुआ ये कि उस 'धार्मिक उन्मादी' समुदाय ने इन लिबरल्स के खिलाफ सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा निकालना शुरू किया. ध्यान दीजिए कि अभी भी ये गुस्सा किसी समुदाय विशेष के खिलाफ या अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं था. ये गुस्सा उन चंद बुद्धिजीवियों के खिलाफ था जो बड़े गर्व से अपने आप को 'खान मार्किट गैंग' बताते हैं, जो दावा करता है कि उसके लिखने या बोलने से परसेप्शन बनता या बिगड़ता है.

और जब इस गिरोह से उम्मीद की गई कि वो दिल्ली में डॉ नारंग की लिंचिंग के खिलाफ भी मुखर होगा या जहांगीरपुरी में अंकित की हत्या के खिलाफ कैंडल मार्च निकाला जाएगा. तो वहां इन्होंने ना सिर्फ निराश किया बल्कि बेतुके तर्कों के जरिये डिफेंड करने की भी कोशिश की. उसके बाद रही-सही कसर पूरी कर दी कठुआ गैंग रेप और मर्डर ने. जहां एक बच्ची के साथ हुए नृशंस अत्याचार के खिलाफ आदर्श लिबरल्स का पूरा जोर इस बात पर रहा कि घटना के पीछे 'देवी स्थान' को हाइलाइट किया जाए और पूरे विश्व में हिंदुत्व और मंदिरों के खिलाफ छवि गढ़ी जाए.

यहां से आउटरेज शुरू हुआ. लोगों को लगा कि सेलेक्टिव प्रोपोगंडा फैलाया जा रहा है, किसी घटना की तह में जाये बगैर हिन्दू-मुसलमान में बांटा जा रहा है और चुनिंदा 100-120 लोग.. करोड़ो लोगों को मोदी को वोट करने की सजा दे रहे हैं. एक बड़े समीक्षक इसपर एक दिलचस्प राय रखते हैं. वो मानते हैं कि एक बड़े वर्ग को (जिसका कोई पॉलिटिकल आइडियोलॉजी नहीं था) खान मार्किट गैंग ने अपने सलेक्टिव एजेंडे के जरिये बीजेपी के करीब पहुंचाया है. और जाने-अनजाने लिबरल्स मोदी को मजबूत ही कर रहे हैं.

आज जब अलीगढ़ में बच्ची के साथ दरिंदगी हुई है और घटना के खिलाफ लोगों में गुस्सा है तो आप पाएंगे कि इसी 'आदर्श लिबरल्स' के बागों में बहार है, उनके टाइमलाइन पर 'पिन ड्राप साइलेंस' है, मानसून पर चर्चा हो रही है. कश्मीर-कश्मीर खेला जा रहा है.

शायद यही कारण है कि धार्मिक रंग देने का जो खेल इस गैंग ने शुरू किया था अब वो अपने शबाब पर है, जो नफरत का पौधा इन्होंने लगाया था वो फल-फूल कर तैयार हो चुका है. इनका क्या.. ये तो एसी कमरों में बैठकर सलेक्टिव प्रोपोगेंडा फैलाते रहेंगे लेकिन समाज में जो गहरी खाई इन्होंने डाल दी है, अब उसके पाटे जाने के आसार कम ही दिख रहे हैं..

(ये लेख विवेक सिंह के फेसबुक पेज से लिया गया है, विवेक ZEE Media Corporation में पत्रकार है।)