कोरोना के इस क्रूर काल में एक एक मौत की गिनती की जा रही है. इस वक्त में भी देश विदेश में ऐसी घटनाएं हो रही हैं जिनमें इंसान ही इंसान की जान ले रहा है. कल यूपी के संभल का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें दो लोगों की हत्या होते देखी जा सकती है. वीडियो में देखा जा सकता है कि कितने आराम से आरोपियों ने गोली मारकर पिता-पुत्र की हत्या कर दी. जम्मू-कश्मीर का आतंकवाद तो रुकने से ही रहा. वहां रोज मुठभेड़ें होती हैं. कुछ दिन पहले काबुल में आतंकियों ने एक अस्पताल को निशाना बनाया जिसमें नवजात बच्चों तक की मौत हो गई.

ये वो दौर है जब लोग घरों में कैद हैं. भारत जैसे देश में न जाने कितने लोग इस वक्त सड़कों पर पैदल जा रहे हैं. तमाम लोग अपनी जान भी गंवा चुके हैं लेकिन हिंसा भी मानवों के मूल स्वभाव में है. ऐसा लगता है कि हिंसा के बगैर मानवों को चैन नहीं पड़ता. हिंसा करने वाले लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितने लोग अपनी जान को खतरे में डालकर अभी भी काम करने जाते हैं. कोई अस्पताल का डॉक्टर, नर्स या सफाई कर्मचारी है, तो कोई मीडिया का रिपोर्टर है. तमाम पुलिसकर्मी भी इन हालात में मोर्चा संभाले हैं लेकिन इन्हीं हालात में लोग जान लेने और देने पर भी तुले हुए हैं.

कोराना और लॉकडाउन के बीच खबरें आती हैं कि किसी शहर से 300 किलोमीटर की दूरी की पहाड़ियां दिखने लगी हैं. हवा 25 साल में सबसे ज्यादा साफ है. गंगा नदी साफ हो चुकी है. ये सब सुनकर लगता है कि हमने प्रकृति को कितना थका दिया था. हमने हर एक क्षेत्र में अति कर दी थी. आज प्रकृति हमसे इस सब का बदला निकाल रही है, फिर भी हिंसा करने वाले आज भी इस सबसे बेखबर हैं. आज भारत और पाकिस्तान दो पड़ोसी देश हैं. दोनों सैन्य क्षेत्र में पर्याप्त शक्तिशाली हैं. दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं लेकिन दोनों के अस्पतालों की दशा खराब है. आज पाकिस्तान की गलत महत्वकांक्षाओं का नुकसान दोनों देशों के लोग उठा रहे हैं. भारत की हालत पाकिस्तान से बेहतर है लेकिन बड़ी आबादी के दबाव में हालात कोई अच्छे नहीं कहे जा सकते. कहा जाता है कि अमेरिका के पास ऐसे हथियार हैं कि वो एलियन को भी मात दे सकता है लेकिन वेंटिलेंटर उसे बाहर से मंगाने पड़ गए. सोचिए अपने हिंसक स्वभाव का खामियाजा किस तरह देश भुगत रहे हैं. जो पैसा शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं में लगना चाहिए था आज वो सेनाओं में लगा हुआ है. कश्मीर में जंग के हालात बने रहते हैं, जवान शहीद होते हैं और आतंकवादी भी मारे जाते हैं. जो संसाधन सकारात्मक क्षेत्र में लगने चाहिए थे, वो आज बेवजह हथियारों में लगे हैं.

भारत की असवेंदनशील सरकारों और खोखले समाज पर पड़ा हल्का फुल्का पर्दा भी हट चुका है

अफगानिस्तान में बीते दिनों आतंकवादियों ने एक अस्पताल पर हमला किया. मरने वालों में अधिकतर नवजात बच्चे थे. जिन्हें नफरत का मतलब भी पता नहीं था, उन बच्चों को आतंकवादियों ने नफरत का निशाना बना दिया. आतंकवादी पहले भी ऐसे कायराना हरकत करते रहे हैं लेकिन इस दौर में भी ऐसे हमले सोचने को मजबूर करते हैं. जब पूरी मानव सभ्यता पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है, उस वक्त में भी इस तरह बच्चों तक की जान ली जा रही है. प्रकृति के साथ खिलवाड़ का नतीजा देखने के बाद भी लोग सुधरने को तैयार नहीं हैं. सिकंदर महान विश्व विजेता बनने निकला था और उसने बहुत सी लड़ाईयां लड़ी लेकिन उसकी मौत एक बीमारी का ही नतीजा थी. राजाओं के तमाम ऐसे उदाहरण हैं, जब कम उम्र में ही उनकी जान बीमारियों से चली गई. महामारियों का अपना एक इतिहास रहा है. लाखों लोगों की मौतें इनसे हुईं हैं, इसलिए कम से कम लोगों को इस वक्त तो शांति रखनी चाहिए. आज कोरोना है, कल को कोई औऱ बीमारी हो सकती है लेकिन हमें इतिहास को पढ़ना होगा. अगर इतिहास को न पढ़कर हमने अपनी गलत हरकतें जारी रखीं, तो इंसान को इतिहास बनते देर नहीं लगेगी.