देश भर में कल कांग्रेस ने बंद का आहवाहन किया था। पेट्रोल डीजल के दामों में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी के विरोध में ये बंद बुलाया गया था। कांग्रेस के सहयोगी दल भी इस बंद में शामिल थे। हालांकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, ओडिशा की बीजू जनता दल और दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने इससे दूरी बना के रखी।

इससे पहले ६ सितम्बर को भी भारत बंद बुलाया गया था और मुद्दा था सवर्णो जातियों का सक/सत एक्ट में सरकार द्वारा किया गया बदलाव। इस दिन बंद काफी शांति पूर्ण तरीके से बिता कुछ एक ट्रैन रोकने की घटनाये अवश्य हुई पर कंही पर भी हिंसा करके सरकारी सम्पति को नुकसान पहुंचने की कोई खबर नहीं आयी।
कल के बंद के दौरान जगह जगह से हिंसा की खबरे आयी। बिहार में ट्रेनों पर पथराव हुआ जगह जगह गाड़ियां तोड़ी गयी।

लोकतंत्र में अपनी बात रखना सभी का हक़ है। कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है, उसका काम सरकार की कमियों का विरोध करना और उन्हें जनता के सम्मुख रखना हैं। पर लोकतंत्र विरोध में हिंसा की अनुमति नहीं देता। अपनी बात रखने के लिए हिंसा करना, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचना, आम जनता को तकलीफ देना ये निश्चित ही विरोध का तरीका नहीं है।

कांग्रेस ने बंद बुलाकर जो राजनैतिक फायदा लेने की कोशिश की वह बंद में हुई हिंसा से उलट ही साबित हुआ है। भले ही कांग्रेस ये दावा कर रही हो की वो जनता की लड़ाई लड़ रही है पर सभी जानते है की सत्ता प्राप्ति ही उसका एक मात्र लक्ष्य है। राफेल लड़ाकू जहाज का मुद्दा उठाते उठाते कांग्रेस ने पेट्रोल डीज़ल का मुद्दा इसलिए उठाने की कोशिश की क्यों की ये मुद्दे सीधे जनता से जुड़े है और २०१९ आम चुनाव में सीधा असर कर सकते है।

कांग्रेस एक ऐसे मुद्दे की तलाश में है जिससे मोदी सरकार को आम चुनाव में घेरा जा सके और सत्ता की दावेदारी पेश की जा सके। कांग्रेस को विपक्ष में रहते हुए शांतिपूर्ण तरीके से जनता की भलाई के मुद्दे संजीदगी से उठाते हुए अपनी जमीन वापस पाने की कोशिश करनी चाहिए न की हिंसा या झूठे आरोप लगा के जनता को गुमराह करके। कांग्रेस को मजबूत विपक्ष की छवि बनानी चाहिए न की भस्मासुर की।