अगले साल होने वाले लोक सभा चुनाव के लिए जोड़ तोड़, गठबंधन बनना और टूटना अभी से शुरू हो गया है। कर्नाटक में जेडीएस के कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण के दौरान जिस तरह से विपक्षी एकता दिखाने का प्रयास किया गया। वंही उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में जिस तरह से पार्टिया बीजेपी के खिलाफ गोलबंद हो रही है, उससे आने वाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी Vs विपक्ष जैसा माहौल बनता दिख रहा है।

बीजेपी जिस तरह से हाल के दिनों में चुनाव लड़ती रही है और सत्ता में आने के लिए जी तोड़ मेहनत करती है उससे विपक्षी एकता बहुत प्रभावी नहीं दिखाई पड़ती।

विपक्ष की पार्टियों का एक मंच पर साथ में बैठना और चुनाव में प्रभावी होना दोनों में बहुत ही फर्क है।

अगर सभी विपक्षी पार्टियों में इतनी ही बढ़िया आपसी समझ होती तो सभी एक ही पार्टी में होते। पर चुकी ऐसा नहीं है इसका मतलब ये है की सभी पार्टियों की अपने वैचारिक मतभेद है।

ज्यादातर रीजनल पार्टीज कांग्रेस से अलग हो कर बनी है और वे जिन प्रदेशो में प्रभावी है उनमे या तो कांग्रेस न के बराबर है या बेहद कमजोर अवस्था में है। उदहारण के तौर पर हम पश्चिम बंगाल को लेते है। ममता बनर्जी कभी कांग्रेस की कद्दावर नेता हुआ करती थी। बंगाल में हुए उपचुनाव में कांग्रेस तीसरे और चौथे स्थान के लिए सीपीआई से संघर्ष करती नजर आयी थी। हाल के दिनों में जिस तरह से ममता बनर्जी की तुस्टीकरण की राजनीति और उसके बाद हुए दंगो ने बीजेपी के पक्ष में गोलबंदी हुई है उसका असर आने वाले लोक सभा चुनाव में जरूर दिखाई देगा।

जब आप एक Vs सभी करने का प्रयास करते है तो आप उन वोटर्स को जो मोदी के उतने समर्थक नहीं है पर आप जिस पार्टी के धुर विरोधी रहे है उसके साथ खड़े हो जाते है तो ऐसे वोटर्स को सोचने पर मजबूर कर देते है।

जरा सोचिये आम आदमी पार्टी और कांग्रेस एक साथ दिल्ली में बीजेपी के खिलाफ आ जाये तो वोटर किसे वोट करेगा ये अपने आप में एक अलग तरह का राजनितिक विषय बन जायेगा।

क्षेत्रीय पार्टिया का एक प्रभाव एक सीमित एरिया में होता है। मंच पर एक साथ दिखना अच्छा लग सकता है पर एक क्षेत्रीय पार्टी दूसरे प्रदेश में कितने प्रभावी होगी ये सभी समझते है। उदहारण के लिए समाजवादी पार्टी का मध्यप्रदेश, राजस्थान या कर्नाटक में क्या प्रभाव हो सकता है। या मंच पर दिखे रालोद के अजित सिंह जो उत्तर प्रदेश में अपनी शाख खो चुके है वो उत्तर प्रदेश के बाहर कितना प्रभावी हो सकते है।

विपक्ष में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की भी कमी नहीं है। मुलायम सिंह यादव, मायावती, शरद पवार, राहुल गाँधी और ममता बनर्जी।

बीजेपी को जो सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है वो उत्तर प्रदेश में हो सकता है। पर इन पांच सालो में बीजेपी ने अपने आप को पूर्व उत्तर के राज्यों, ओडिशा, बंगाल और कर्णाटक में काफी मजबूत किया है। वो उत्तर प्रदेश में होने वाले नुकसान को इन राज्यों से पूरा कर सकते है। आने वाले लोकसभा चुनाव दिलचस्प जरूर होंगे पर आसान किसी के लिए नहीं होंगे।