इस तस्वीर को ध्यान से देखिए .ये 21वीं सदी के उस भारत की तस्वीर हैं जहां एक बाप सीवर साफ करने जाता है और वापस जिंदा लौटकर नहीं आता.उसका बेटा उसकी लाश के पास जाता है और लाश पर पड़े कफन को हटाकर रोने लगता है.तस्वीर को देखकर हम इंसान तो क्या शायद किसी हैवान का दिल भी पिघल जाए लेकिन हैवानों से बदतर हो चुके हमारे सिस्टम की आंखे शायद ही इस बच्चे के दुख को देख सकें और दिल उस वेदना को महसूस कर सके जो ये बच्चा अभी कर रहा होगा.

क्या भारत आज के इस युग में ये दिन देखकर शर्म से पानी पानी नहीं हो जाता.जो भारत आए दिन दूसरे देशों के उपग्रह अपनी तकनीक से अंतरिक्ष भेजता है उस भारत की राजधानी के बीचों बीच 5 लोग अपनी जान सीवर साफ करते हुए गंवा देते हैं और किसी का ध्यान उस ओर नहीं जाता.क्या ये शर्म का विषय नहीं है की राजधानी दिल्ली में आज भी सीवर साफ करने की मशीने नहीं औऱ लोगों को सीवर में घुसकर उसकी सफाई करनी पड़ती है.नेताओं के विकास के बेशर्म दावों के बीच इन गरीब लोगों के लिए शायद कोई जगह नहीं है अगर होती तो कम से कम देश की राजधानी में तो ये घटना नहीं घटती.

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट कहती है कि जनवरी 2017 के बाद से देश में हर 5 दिन में एक आदमी की मौत सीवर साफ करते हुए होती है.सफाई कर्मचारियों के हितों के लिए बनाए गए राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग ने ये आंकड़े जारी किए हैं.आपको बतादें की देश के सबसे विकसित क्षेत्रों में से एक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बीते हफ्ते कुल 6 लोगों की सीवर साप करते हुए हो चुकी है.

आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2017 के बाद से अब तक देश में 123 लोगों की मौत सीवर की सफाई करते हुए हो चुकी है.खास बात ये है की आयोग के अधिकारी भी मानते हैं की ये डाटा अधूरा है और संख्या कहीं ज्यादा हो सकती है.साथ ही देश के मात्र 13 राज्यों के आंकड़ो के आधार पर ही संख्या बताई गई है.

हमारे देश में उन लोगों की कोई संख्या तक का पता सरकार को नहीं जो लोग रोजगार के तौर पर सीवर की सफाई करते हैं.सफाई कर्मचारी आयोग के प्रमुख मनहर वाजीभाई जाला के अनुसार सरकारों को इन लोगों की सही पहचान करने को कहा गया लेकिन राज्यों ने मैला उठाने पर बैन का हवाला देते हुए ऐसा करने से मना कर दिया. सरकारों के इस रवैये से सीवर में जाने वाले मजदूर अपनी जान तो गंवाते ही हैं साथ ही उनके परिवारों को सरकारी मुआवजा तक नहीं मिलता.आयोग के अनुसार कुल 123 मजदूरों की मौतों में से 70 के परिवार को ही सरकारी मुआवजे का फायदा मिल पाया.सफाई कर्मचारियों के लिए संघर्ष करने वाले संगठन सफाई कर्मचारी आंदोलन के प्रमुख बेजवाडा विल्सन कहते हैं सफाई कर्मचारी आयोग का आंकड़ा गलत है और जनवरी 2017 से अब तक कुल 123 लोगों की मौत हो चुकी है.

स्वच्छ भारत मिशन भारत सरकार की प्राथमिकता में रहा है.बीते दिनों पीएम मोदी ने राजधानी दिल्ली के पहाड़गंज में झाड़ू लगाकर स्वच्छता ही सेवा मिशन की शुरूआत भी की लेकिन क्या सीवर में उतरकर लोगों को तमाम बीमारियों से बचाने वाले और सफाई करने वाले इन पिताओं की जान की कीमत भी देश में है या नहीं.सरकार को कम से कम इस युग में तो ये सुनिश्चित करना चाहिए की लोग इस इस तरह के काम करते हुए अपनी जान न गंवाएं की मानवता भी अपने आंसू पोंछने को मजबूर हो जाए...